Learning


 अधिगम Learning 


(अभ्यास एवं अनुभूति के द्वारा व्यवहार में हुआ अपेक्षाकृत स्थाई परिवर्तन।)


हिलगार्ड के अनुसार:- व्यवहार परिवर्तन बहुत प्रकार से देखे जा सकते हैं।

जैसे नींद, भूख, प्यास, काम, मदिरापान, नशीली दवा, संवेग आदि। किंतु सही प्रकार से यह अधिगम नहीं है।


अधिगम का अर्थ :- अधिगम का सामान्य अर्थ व्यवहार में हुआ परिवर्तन माना जाता है। परंतु हर व्यवहार में हुआ परिवर्तन अधिगम नहीं होता। क्योंकि भूख-प्यास, मदिरापान, नशीली दवा, संवेग से भी व्यवहार में परिवर्तन हो जाता है, परंतु यह व्यवहार में परिवर्तन क्षणिक होता है। अतः व्यवहार में हुआ वह परिवर्तन जो अपेक्षाकृत अस्थाई होता है वह अधिगम कहलाता है।

परिभाषा:- अभ्यास एवं अनुभूति से व्यवहार में हुआ अपेक्षाकृत व्यवहार परिवर्तन ही अधिगम है। 

बुडवर्थ के अनुसार:- नवीन ज्ञान एवं नवीन प्रतिक्रिया को प्राप्त करने की प्रक्रिया ही सीखना है। 


अधिगम का अर्थ:- अधिगम जन्म से लेकर मृत्यु तक चलने वाली प्रक्रिया है। व्यक्ति प्रत्येक परिस्थितियों से सीखता है । और अपने व्यवहार में परिवर्तन करता है यही अधिगम है।

सीखने की प्रक्रिया एक मानसिक प्रक्रिया है। यह क्रिया जीवन भर निरंतर चलती रहती है। अधिगम की प्रक्रिया को दो भागों में बांट सकते हैं।

1 निरंतरता  

2 सार्वभौमिकता 

इसलिए व्यक्ती अधिगम न केवल शिक्षण संस्थान में बल्कि परिवार, समाज, संस्कृति, सिनेमा, सड़क, पड़ोसियों, संगी-साथीयो, अपरिचित व्यक्तियों, वस्तुओं तथा स्थान सभी से थोड़ा बहुत शिक्षा ग्रहण करता है।


बुडवर्थ के अनुसार:- सीखना विकास की प्रक्रिया है, यह एक व्यापक, सतत एवं जीवन पर्यंत चलने वाली प्रक्रिया है। सीखना सक्रिय प्रतिक्रिया है।


उदाहरण:- जैसे एक छोटा बालक जब घर में दीपक के पास जाकर उसको अनजाने में स्पर्श करता है तो जल जाता है। फिर भविष्य में पुनः वह ऐसी गलती दीपक के साथ नहीं करता है। क्योंकि पहले वह दीपक से अधिगम कर चुका है।

 


अधिगम की परिभाषाएं 

व्यक्ति के व्यवहार में अभ्यास, प्रशिक्षण, अनुभव के कारण आए स्थाई परिवर्तन को अधिगम कहते हैं।


क्रो एंड करो के अनुसार:- आदत, अभिवृत्ति और ज्ञान का अर्जन करना अधिगम कहलाता है।

गिलफोर्ड के अनुसार:- व्यवहार के कारण व्यवहार में आया कोई भी परिवर्तन अधिगम है। 

विलियम वुडवर्थ के अनुसार:- दो परिभाषाएं हैं 


1 :- अधिगम विकास की एक प्रक्रिया है।

2:- नवीन ज्ञान एवं नवीन प्रक्रियाओं का अर्जन ही अधिगम है।

बीएफ स्किनर के अनुसार:- अधिगम व्यवहार में उत्तरोत्तर अनुकूलन की प्रक्रिया है। 

आइजेंक के अनुसार:- अधिगम नवीन या नया अस्थाई परिवर्तन के अंतर्गत सीखने की प्रक्रिया है।

गेट्स के अनुसार:- प्रशिक्षण और अनुभव के कारण व्यवहार में आया परिवर्तन अधिगम है।

काल्विन के अनुसार:- पहले से निर्मित व्यवहार में अनुभव द्वारा हुए परिवर्तन को अधिगम कहते हैं। 


 अधिगम के पक्ष 

1 संज्ञानात्मक पक्ष - ज्ञान या संज्ञान द्वारा अधिगम।

2 क्रियात्मक पक्ष - क्रिया द्वारा अधिगम।

3 भावात्मक पक्ष - (मन)दूसरों की भावनाओं से सीखना।

अधिगम के प्रकार 

गमक अधिगम:- गमक मतलब 'शरीर' व्यक्ति अपने शरीर के द्वारा विभिन्न प्रकार की जो क्रिया करता है वह क्रिया ही गमक क्रिया कहलाती है। 

जैसे छोटा बच्चा गेंद को देखता है तो उसे अपने हाथ से बार-बार पकड़ने की क्रिया करता है।

गमक अधिगम करने में अनुकरण विधि का प्रयोग होता है। यह सर्वाधिक शैशवावस्था में होती है। क्योंकि छोटे बच्चों में अनुकरण की क्षमता सबसे ज्यादा होती है। जैसे छोटे बच्चों से बोलो पापा वह पापा बोलता हैं।


प्रतिबोधनात्मक अधिगम:- संप्रत्यय मस्तिष्क में किसी बोले गए शब्द का चित्र बनना। 

“मस्तिष्क में बनने वाला बिम्ब ही प्रतिबोधनात्मक है। यह बाल्यावस्था में पाया जाता है” 

प्रयत्न एवं भूल का अधिगम ही की आवश्यकता होती है  

संकल्पनात्मक अधिगम:- कल्पनाओं का अधिगम। किशोरावस्था में ज्यों ही बच्चों के मस्तिष्क का विकास होता है, इस मस्तिष्क में विभिन्न प्रकार की कल्पनाएं आती हैं और कल्पना यह दर्शाती है कि बालक के मस्तिष्क विकास चरम सीमा पर हैं।

“सूझ के माध्यम से अधिगम होता है, सूझ अधिगम का प्रयोग।”


अधिगम की विशेषता 


अधिगम एक प्रक्रिया है:- अधिगम करने के लिए आपको एक निश्चित प्रक्रिया के द्वारा गुजरना पड़ेगा अधिगम तब होगा जब आप अभ्यास करेंगे। अर्थात अभ्यास-प्रशिक्षण और अनुभव के कारण यदि व्यवहार में अस्थाई परिवर्तन होगा तो वही अधिगम होगा।

अधिगम सदैव उद्देश्य पूर्ण होता है:- सीखने के लिए हमेशा एक उद्देश्य की आवश्यकता होती है बिना उद्देश्य के अधिगम नहीं होता है।

अधिगम जन्म या जीवन पर्यंत चलने वाली प्रक्रिया है:- बच्चा जन्म से मृत्यु तक सीखता रहता है जब बच्चे का जन्म होता है, 24 घंटे के अंदर ही वह; अपनी आंखों पर समन्यवय स्थापित करता है। पहले सीखना फिर मृत्यु के समय तक भी घर वालों से कुछ सीखता है और सिखाता है।

अधिगम एक क्रिया आधारित प्रक्रिया है (क्रियात्मक प्रक्रिया):- जैसे अगर आपको ढेर सारी पुस्तक दे दिया जाए तो आप बिना क्रिया किये वह अधिगम नहीं कर सकते है। 

पर क्रिया अपने लक्ष्य, आवश्यकता, योग्यता इन सब जैसी किसी एक विषय वस्तु को लक्ष्य मानकर क्रिया किया जाता है।

अधिगम सकारात्मक एवं नकारात्मक दोनों प्रकार का होता है:- यदि आप प्रार्थना सीखे तो प्रार्थना आप कर सकते हो यह सकारात्मक है।

और गाली या गलत आदत सीखने की प्रक्रिया नकारात्मक अधिगम है। अधिगम सकारात्मक हो या नकारात्मक हो व्यक्ति अधिगम को समाज में सीखता है। 

अधिगम एक स्वाभाविक प्रक्रिया है नहीं है:- स्वाभाविक मतलब अपने आप होता है अर्थात अधिगम अपने आप नहीं होता इसके लिए क्रिया करना पड़ता है।


अधिगम में कई प्रकार की विधियां शामिल हैं:- अधिगम करने मतलब सीखने के सभी विधियां शामिल हैं। 

अधिगम में अध्यापन मित्र मंडली और परिवार महत्वपूर्ण है:- मित्र मंडली के कारण अधिगम ना होना । परिवार की दशा-दिशा उचित न होने पर अधिगम ना होना । अध्यापक का ठीक से न मिल पाने से अधिगम ना होना। 

अधिगम सदैव नवीन नहीं होता है:- जो भी आप सीख रहे हो ऐसा नहीं है कि वह नया हो जैसे पहले किसी पुस्तक को पढ़ लेना नया पर वही पुन: पढ़ना नवीन नहीं होता है। 

अधिगम व्यवहार में परिवर्तन की प्रक्रिया है:- 

व्यवहार में परिवर्तन तीन तथ्यों पर आधारित होता है 

अभ्यास 

अनुभव 

प्रशिक्षण 

अधिगम से ही सर्वांगीण विकास संभव है:- 

अधिगम से सर्वांगीण विकास होता है ज्ञानात्मक, भावनात्मक, भावात्मक, क्रियात्मक किसी भी पक्ष में पढ़ो सर्वज्ञ विकास संभव है।


अधिगम के सिद्धांत 


व्यवहारवादी सिद्धांत 

संज्ञावादी सिद्धांत 

व्यवहारवादी सिद्धांत 

व्यहरवादी सिद्धान्त के मनोवैज्ञानिक 

EP पवलव

BF स्किनर 

थार्नडाइक

CL हल 

संज्ञानवादी सिद्धांत 

इसमें एक संप्रदाय आया था गेस्टाल्ट संप्रदाय इसमें कई लोग हैं जैसे 

मैक्स वर्दीमर 

कोहलर 

कर्ट लेविन 

कर्ट कोफ्का

व्यहरवादी सिद्धान्त

 पुनर्बलन 

अनुक्रिया 

उद्दीपक 

अभिप्रेरणा 

यंत्रवत-अधिगम 

पशु+मानव अधिगम धीरे-धीरे होता है ।

अधिगम अनुबंधन वादी होता है ।

संज्ञानवादी सिद्धांत 

संवेदना 

बुद्धि 

प्रत्यक्षीकरण 

समस्या 

यह यंत्रवत नहीं होता ।

केवल मानव 

अचानक 

अधिगम समस्या समाधान करना ही अधिगम है ।


प्रतिक्रिया:- किसी के बदले में किया गया कार्य।

सहज क्रिया:- प्याज कटते समय आंशू आना ।

हाथ में रोटी देख के बंदर छीनने लगता है 

अनुक्रिया:- लक्ष्य के प्रति किया गया क्रिया अनुक्रिया ।

उद्दीपक:- लक्ष्य

वह वातावर्णीय घटक जिसे प्राणी अपने अनुक्रिया द्वारा प्राप्त करना चाहता है।

अनुक्रिया- अनुबंधन -उद्दीपक


यदि प्राणी क्रिया करके अपने उद्दीपक को प्राप्त कर लेता है तो इन दोनों के मध्य एक संबंध बनता है जिसे हम अनुबंध कहते हैं। यह व्यवहारवादी कहते हैं।


 “अनुक्रिया और उद्दीपक के मध्य बनने वाले संबंध को हम अधिगम कहते हैं” 


संज्ञानात्मक सिद्धांत 

आंख

कान 

नाक 

त्वचा 

जीभ 

यह सब संवेदना है। इंद्रियों से प्राप्त होने वाला प्रथम ज्ञान संवेदना कहलाता है ।

मानसिक पीढ़ी का प्रथम ज्ञान को संवेदना कहते हैं।


प्रत्यक्षीकरण:- इसमें नाम, पहचान, व्याख्या होता है। संवेदना से संबंधित संवेदना के ठीक बाद का ये स्तर है। प्रत्यक्षीकरण से आपके अंदर जिसका निर्माण होता है उसे संज्ञान या ज्ञान कहते हैं। संज्ञान के बाद सूझ आता है। समस्या का समाधान करने में सूझ का योगदान होता है।

संज्ञानवादियो के अनुसार अधिगम समस्या समाधान करने की एक प्रक्रिया है यह प्रक्रिया इस प्रकार होती है।


 संज्ञान 

सूझ समस्या समाधान कर्ता है।

प्रत्याक्षीकरण 

नाम, पहचान, व्याख्या। 

संवेदना 

आंख

कान 

नाक 

त्वचा 

जीभ 


 


व्यवहारवादियों का सिद्धांत 

एडवर्ड ली थार्नडाइक अमेरिकी मनोवैज्ञानिक थे। इन्होंने अपना जीवन एक शिक्षक के रूप में बिताया था। यह एक पहले मनोवैज्ञानिक हैं जिन्होंने पशुओं पर अध्ययन किया इसीलिए इनको पशु मनोविज्ञान का जनक भी कहा जाता है। 

प्रथम शैक्षिक मनोवैज्ञानिक हैं।

सीखने के प्रथम नियम इसी ने दिया था।

थार्नडाइक के सीखने के प्रमुख दो नियम हैं।

मुख्य नियम

अभ्यास का नियम 

अनुक्रिया ------------ उद्दीपक

अनुबंध मजबूत होगा

👇

अभ्यास की पुनरावृत्ति

👇

अभ्यास की कमी

👇


अनुबंध कमजोर 




चित्र 1 



थार्नडाइक ने फिर 1930 में, संशोधन करके कहा; यह जरूरी नहीं की अभ्यास की पुनरावृत्ति से अनुबंध मजबूत हो। यह भी जरूरी नहीं अभ्यास की कमी से अनुबंध कमजोर हो।

जैसे स्कूल में बार-बार प्रार्थना का पुनरावृति से भी प्रार्थना याद नहीं होता।

जैसे कई बार किसी विषय वस्तु को एक बार ही पढ़ने से ही वह विषय वस्तु याद हो जाता है।

1930 में इसी प्रकार संशोधन से थार्नडाइक दो उपभागों में विभाजित किया। 

प्रयोग 

अनुप्रयोग 

प्रयोग:- इस नियम का तात्पर्य है अभ्यास व्यक्ति को कुशल बनता है। यदि हम किसी कार्य का अभ्यास करते रहते हैं तो हम उसे सरलता पूर्वक करना सीख जाते हैं और उसमें कुशल हो जाते हैं। 

अनुप्रयोग:- इस नियम का अर्थ यह है कि यदि हम किसी सीखे हुए कार्य का अभ्यास नहीं करते हैं तो हम उसको भूल जाते हैं अभ्यास के माध्यम से ही हम उसे स्मरण रख सकते हैं। 

प्रभाव का नियम/ परिणाम/ संतोष या असंतोष का नियम:- 

अनुक्रिया उद्दीपक 

पुरस्कार,प्रशंसा संतोष है तो अनुबंध मजबूत।

भय,दंड असंतोष मिले तो अनुबंध कमजोर होगा । उसमें अनुक्रिया और उद्दीपक का प्रभाव कार्य पर पड़ता है।

प्राणी को जैसा परिणाम मिले तो इसे दो परिणाम का सिद्धांत कहते हैं। 

तत्परता का सिद्धांत 

तैयारी का नियम 

प्रेरणा का नियम 

मानसिक तैयारी का नियम 

जैसे 30 आदमी घोड़े को लेकर तालाब जा सकते हैं। पर वहीं पर 40 आदमी मिलकर के उसको पानी नहीं पिला सकते हैं, क्योंकि घोड़ा पानी पीने के लिए तत्पर नहीं है। 

थार्नडाइक का गौड़ नियम

बहुक्रिया का नियम 

आशिक क्रिया का नियम 

मनोवृत्व का नियम 

सादृश्यता का नियम 

सहचर्य का नियम 


बहु क्रिया का नियम:- इस नियम का अभिप्राय यह है कि जब हम कोई नया कार्य करना सीखते हैं , तब हम उसके प्रति अनेक और विभिन्न प्रकार की प्रतिक्रियाएं करते हैं। कुछ समय तक प्रार्थना करने के बाद हमें उस कार्य को करने की ठीक-ठाक विधि या उपाय मालूम हो जाता है। प्रयत्न और भूल द्वारा सीखने का सिद्धांत इसी नियम पर आधारित है।

प्राणी अपने लक्ष्य (उद्दीपक) के प्रति अनेक क्रिया करता है। तो उसके मध्य का संबंध मजबूत बनता है तो प्राणी अधिगम कर लेगा।

 

R S

                                                   मजबूत अधिगम 


आंशिक क्रिया का नियम (विश्लेषणात्मक)

इस नियम का अनुसरण करके हम जिस कार्य को करना चाहते हैं उसे छोटे-छोटे अंशो या भागों में विभाजित कर लेते हैं। इस प्रकार का विभाजन कार्य को सरल एवं सुविधाजनक बना देता है। इस नियम पर अंश से पूर्ण की ओर का शिक्षण सूत्र का सिद्धांत आधारित किया जाता है।

मनोवृति का नियम मन- मस्तिष्क वृत्त- नजरिया/दृष्टिकोण - यदि मन की वृत्ति सकारात्मक होगा तो अधिगम होगा यदि मन की वृत्ति नकारात्मक होगी तो अधिगम नहीं होगा। 

यदि किसी कार्य को करने के लिए यदि हम मन से तत्पर नहीं है तो उस कार्य को या तो देर में सीखते हैं। या त्रुटि करना शुरू कर देते हैं।

सादृश्यता का नियम या आत्मीकरण का नियम इस नियम का अभिप्राय यह है कि हम जो भी नया ज्ञान प्राप्त करते हैं उसे आत्मसात कर लेते हैं। दूसरे शब्दों में हम नवीन ज्ञान को अपने पूर्व ज्ञान का स्थाई अंग बना लेते हैं। यही कारण है कि जब शिक्षक बालक को कोई नई बात सिखाता है तब उसका पहले सीखी हुई बात से सम्बंध स्थापित कर देता है। 

जैसे साइकिल के बाद बाइक अपने आप चलाना जान जाएंगे।

संबंधित परिवर्तन का नियम यह साहचर्यात्मक का नियम इस नियम का अभिप्राय है पहले कभी की गई क्रिया को उसी के समान दूसरी स्थिति में उसी प्रकार करना। इसमें क्रिया का स्वरूप तो वही रहता है पर स्थिति में परिवर्तन हो जाता है।

जैसे कुत्ता उड़ , चिड़िया उड़ में एक बार कुत्ता भी उड़ा देती हैं।

उदाहरण यदि एक मां का बच्चा मर जाता है तो वह उसके वस्तुओं को इस प्रकार से सीने से लगाती हैं, जिस प्रकार वह अपने बच्चों को सीने से लगाती थीं।

इसमें संवेदनशील होकर के सीरियस होकर के पढ़ना चाहिए। इसलिए बच्चा जितना अधिक सीरियस होकर पढ़ेगा उतना ही वह अच्छे से अधिगम कर पाएगा।

विषय वस्तु के साथ में कितना तालमेल संबंध (अंतः क्रिया) स्थापित कर पाते हैं। 



व्यवहारवादियों का सिद्धान्त थार्नडाइक

 

प्रयत्न और भूल का सिद्धांत 

थार्नडाइक ने इस सिद्धांत को अनेक उपनाम से भी पुकारा है।

संबंधवाद सिद्धांत 

अनुक्रिया और दीपक का सिद्धांत 

प्रयत्न और भूल का सिद्धांत 

प्रयास एवं त्रुटि का सिद्धांत 

संयोजनवादी सिद्धांत 

थार्नडाइक ने इस सिद्धांत का प्रयोग बिल्ली पर किया। दूसरा यह अनेक जानवर जैसे चूहा, चूजा, खरगोश आदि पर प्रयोग किया था।  

E.L.थार्नडाइक ने 1913 में प्रकाशित होने वाली अपने पुस्तक शिक्षा मनोविज्ञान में इस नियम को प्रतिपादित किया। 

सिद्धांत का अर्थ जब व्यक्ति कोई कार्य करता है तब उसके सामने एक विशेष स्थिति या उद्दीपक होता है, जो उसे एक विशेष प्रकार से प्रक्रिया करने के लिए प्रेरित करता है। इस प्रकार एक विशिष्ट उद्दीपक का एक विशिष्ट प्रतिक्रिया से संबंध स्थापित हो जाता है। जिसे उद्दीपक प्रतिक्रिया संबंध द्वारा व्यक्त किया जा सकता है। इसलिए संबंध के फल स्वरुप जब व्यक्ति भविष्य में इस प्रकार के उद्दीपक का अनुभव करता है। तब वह उससे संबंधित उसी प्रकार की प्रतिक्रिया या व्यवहार करता है। थार्नडाइक अपने सिद्धांत की व्याख्या करते हैं। 

“सीखना संबंध स्थापित करना है संबंध स्थापित करने का कार्य मनुष्य का मस्तिष्क करता है”


प्रयत्न और भूल का सिद्धांत 

किसी कार्य को हम एकदम से नहीं सीख पाते हैं। सीखने की प्रक्रिया में हम प्रयत्न करते हैं और बाधाओं के कारण भूल भी होते हैं। लगातार प्रयत्न करने से सीखने में प्रगति होती है। और भूल कम होती हैं। अतः किसी क्रिया के प्रति बार-बार प्रयास करने से भूल का हास होता है, तो इसको ही प्रयत्न और भूल का सिद्धांत कहते हैं।

 

मुख्य बिंदु 

प्रयत्न और भूल के सिद्धांत का जन्म 

प्रयत्न और भूल के सिद्धांत की विशेषताएं 

थार्नडाइक का प्रयोग 

प्रयत्न और भूल के सिद्धांत के प्रयोग के महत्वपूर्ण तथ्य।

प्रयत्न भूल के सिद्धांत का अधिगम में महत्व आदि। थार्नडाइक ने इस सिद्धांत को 1898 में प्रतिपादित किया था इस सिद्धांत द्वारा उन्होंने यह पता लगाया कि पशुओं और मानवो को सिखाने में प्रयासों और भूलों का विशेष महत्व है। 


वूडवर्थ के अनुसार प्रयत्न और त्रुटि में किसी कार्य को करने के लिए, अनेक प्रयत्न करने पड़ते हैं; जिसमें अधिकांश गलत होते हैं।

एल0रेन0 के अनुसार संयोजन सिद्धांत वह सिद्धांत है जो यह मानता है कि प्रक्रियाएं स्थिति और प्रतिक्रिया में होने वाले भूल या अर्जित कार्य सम्मिलित हैं। 


इस प्रकार सीखने में व्यापक दशाओं का होना आवश्यक है 

1 पशु या मानव के सामने लक्ष्य स्पष्ट रूप से हो या वह पूर्ण रूप से प्रेरित हो जैसे बिल्ली के सामने मछली प्राप्त करके अपनी भूख मिटाना। 

2 जब व्यक्ति या पशु ऐसी स्थिति या समस्या में पड़ जाए कि उसका हाल समझ में ना आता हो।


प्रयत्न एवं भूल के सिद्धांत की शैक्षिक उपयोगिता 


अधिगम ही संयोजन है थार्नडाइक ने अपने प्रयोग से यह निष्कर्ष निकाला कि अधिगम की क्रिया का आधार स्नायुमण्डल है। 

स्नायुमंडल में एक नाड़ी का दूसरी नाड़ी से संबंध हो जाता है। (स्नायु नर्वस सिस्टम तंत्रिकातंत्र)


सरल से कठिन इस सिद्धांत के अनुसार अध्यापक विद्यार्थियों को सरल से कठिन, ज्ञान से अज्ञात और प्रत्यक्ष से अप्रत्यक्ष की ओर चलने को कहता है। 

लक्ष्य-केंद्रित हर क्रिया में एक लक्ष्य होता है और मनुष्य उस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए प्रयास करता है। 


स्व:अधिकार इस सिद्धांत के अनुसार विद्यार्थी अपने आप सीखने की कोशिश करते हैं। उनके प्रयास में पहले तो त्रुटियां होती हैं , लेकिन धीरे-धीरे उनकी कमियां कम होने लगती हैं। 

अभ्यास द्वारा सीखना यह बात प्रसिद्ध है कि अभ्यास व्यक्ति को कुशल बना देता है। अभ्यास के माध्यम से ही शिक्षक बालक को ज्यादा से ज्यादा शिक्षा दे सकता हैं। 

सूझ-बूझ द्वारा सीखने में प्रयोग सूझ-बूझ द्वारा सीखने की प्रक्रिया में प्रयास और भूल विधि का समावेश होता है। इसके बिना सूझ-बूझ का प्रयोग नहीं हो सकता। 

कौशल का विकास इस सिद्धांत के द्वारा छात्रों में उनके कौशलों का विकास किया जा सकता है। उदाहरण के लिए नाचना, गाना, संगीत सीखना, टाइप करना आदि। 

अच्छी आदतों का विकास इस सिद्धांत से बालक में अच्छी आदतें पैदा होती हैं। जैसे बड़ों का आदर करना , धैर्य रखना , मेहनत करना सत्य बोलना आदि। 

प्रेरणा का महत्व थार्नडाइक के इस सिद्धांत में विद्यार्थियों को अभी प्रेरित करने पर जोर दिया है। उसके लिए अध्यापक दंड, प्रशंसा, पुरस्कार आदि की सहायता से ले सकता है। 

वैज्ञानिक आधार विश्व में कई वैज्ञानिक अनुसंधान कार्य प्रयास और भूल के सिद्धांत पर काम कर रहें हैं।


प्रयास एवं भूल के सिद्धांत की विशेषताएं अधिगम इसी संयोजन है थार्नडाइक ने अपने प्रयोग से यह निष्कर्ष निकाला है कि अधिगम की क्रिया का आधार स्नायुमंडल है। 

संयोजन सिद्धांत संयोजन सिद्धांत मनोविज्ञान के क्षेत्र में नवीन विचारधारा तो है ही साथ ही वह अधिगम का महत्वपूर्ण सिद्धांत भी है।

संपूर्ण इकाई नहीं यह मत संयोगों को बहुत महत्व देता है। जो व्यक्ति जीवन में अधिक संयोग बना पाता है उतना ही बुद्धिमान कहलाता है। 

प्रयत्न एवं भूल के सिद्धांत का अधिगम में महत्व छात्र प्रोत्साहन इस सिद्धांत से स्पष्ट होता है की छात्रा को सीखने और उत्साहित करने के लिए उनमें प्रेरणा, लक्ष्य, उद्देश्य का होना आवश्यक है। अतः इस सिद्धांत से छात्र प्रोत्साहित होते हैं। 

स्वकार्य ही प्रवृत्ति में विकास छात्र अपने कार्य को स्वयं करना सीखे। समस्या का समाधान स्वयं करें। ताकि वह अपने में विश्वास पैदा कर सके। प्रयत्न और भूल के द्वारा बच्चों में नैसर्गिक प्रतिभा का विकास होता है। 

अभ्यास पर बल छात्रों को अभ्यास का अर्थ प्रयोग एवं महत्व बताना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति अभ्यास से ही महान बनते हैं। 

चिंतन शक्ति का विकास इस सिद्धांत में बालकों का मस्तिष्क लगातार क्रियान्वित रहता है वह प्रत्येक प्रतिचार को तर्कशक्ति पर तौलता है। अतः चिंतन के द्वारा ज्ञान के रास्तों को प्राप्त करता है। 

समस्या समाधान बालक के सामने समस्याएं आती हैं, प्रत्येक स्थान पर शिक्षक उपलब्ध नहीं होता है । अतः प्रश्नों के द्वारा ही वह अपनी समस्या का हल खोज लेता है। 

समय एवं शक्ति की बचत प्रयत्न एवं भूल के सिद्धांत के द्वारा सीखने पर बच्चों की शक्ति, धन, समय की बचत होती है। वह सही प्रतिचारों का चुनाव कर लेता है और उसका अभ्यास करके कार्य को शीघ्र सीख जाता है। 

सभी वर्गों के लिए बच्चों एवं बड़ों, मंदबुद्धि या प्रतिभाशाली सभी वर्गों के लिए यह सिद्धांत उपयोगी है।

जैसे डॉक्टर मंगल के अनुसार थार्नडाइक ने अपने सिद्धांत द्वारा सीखने को उद्देश्यपूर्ण एवं लक्ष्य निर्देशित बनाने तथा अभिप्रेरणा को सीखने की प्रक्रिया का अमूल्य अंग बनाने का प्रयत्न किया है। 


प्रयत्न और भूल के सिद्धांत के प्रयोग के महत्वपूर्ण तथ्य 

प्रारंभ में अनेकों लक्ष्यहीन क्रियाओं को करना।

प्रेरणा द्वारा प्रयत्नो में तेजी लाना। 

आकस्मिक सफलता प्राप्त करना। 

अभ्यास का प्रभाव। 

संवेदना और प्रतिचार में संबंध का ज्ञान। 

सही प्रतिचारों का चुनाव करना और गलत प्रति चारों को भूलना ।



थार्नडाइक का बिल्ली पर प्रयोग


थार्नडाइक ने समस्या बॉक्स नामक पिंजरे में एक भूखी बिल्ली को बंद कर दिया। पिंजरे के बाहर मछली के मांस की तस्तरी रख दी; जिसकी सुगंध बिल्ली को अनुभव हो रही थी। अतः बिल्ली पिंजरे के बाहर आने के लिए तारों पर पंजा मारना, उन्हें काटना, पिंजड़े की सतह को दबाना और उछाल-कूद आदि क्रिया करने लगी। उस समय यह क्रियाएं लक्ष्य थी बाद में इन्हीं क्रियाओं को करते समय अचानक सिटकनी पर उसका पैर पड़ गया और पिंजड़े का दरवाजा खुल गया। बिल्ली बाहर आई और भोजन प्राप्त कर लिया। 

इसी प्रकार बिल्ली को सिटकनिक खोलकर बाहर आने के लिए 100 प्रयासों से गुजरना पड़ा।




चित्र 1 बिल्ली का 






प्रयास और भूल सिद्धांत की सीमाएं 

इस सिद्धांत के अनुसार हर अधिगम संभव नहीं है कई बार बहुत प्रयास करने के बाद भी सफलता नहीं मिलती।

इस विधि से स्थान नियंत्रण बहुत कम होता है। 

इस विधि में समय और शक्ति बहुत लगती है। व्यर्थ की कोशिश से समय बेकार जाता है। 

इस विधि की प्रक्रिया एक धीमी गति से होती है।  

इसी कारण प्रतिभाशाली बच्चे इसे कम पसंद करते हैं।

और मंदबुद्धि वाले बालक अधिक पसंद करते हैं। 

यह एक यांत्रिक विधि है इस विधि में विधि से बुद्धि का प्रयोग नहीं किया जाता है। 




चित्र 1 





अधिगम के प्रकार 

उसबेल के अनुसार 


अभिग्रहण सीखना जब किसी बालक को कोई विषय सामग्री दे दी गई हो तो वह बच्चा अगर रट कर पढ़ लिया या समझकर पढ़ लिया या अभिग्रहण सीखना है।

रट कर सीखना जब बच्चे को कोई विशेष सामग्री दे दी जाए और बच्चा हू-बहू सिर्फ वही रट कर याद कर ले तो वही रट कर सीखना है। 

जैसे शिरीज को रटने वाला यह भी लिख देता है कि पेज नंबर 6 में विस्तृत देखें। 

अन्वेषण सीखना इसमें भी बालक को एक विषय सामग्री को एक समस्या के रूप में दे दिया जाता है। तब बालक समस्या सामग्री को खोज करके इधर-उधर परख कर सीखना फिर जवाब देना ही अन्वेषण सीखना है। 

जैसे खाना क्यों नहीं पचता? पाचन तंत्र कमजोर है? 


अर्थपूर्ण सीखना जिसमें बालक को कोई विषय सामग्री नहीं दिया जाता, इसमें शिक्षक खुद एक बिंदु को स्पष्ट करता हैं तब बालक को समझ आता है यह अर्थपूर्ण सीखना हुआ। 

जैसे किसी कविता या कहानी को अर्थ सहित अध्यापक बच्चे को सिखाता है तो बच्चा सीख जाता है अर्थपूर्ण सीखना है। 

राबर्ट गेने के अनुसार 

समस्या समाधान 

नियम 

संप्रत्यय सीखना 

विभेदीकरण 

शब्दिक सहचर्य 

सरल रेखा / श्रृंखला अधिगम 

उद्दीपक परिवर्तन 

सांकेतिक सीखना 


संकेत सीखना यहां पावलव के अधिगम सिद्धांत से संबंधित है। इसमें बालक संकेतों का ज्ञान कराना सीख जाता हैं।

जैसे बच्चों को ट्रैफिक लाइन का ज्ञान करना। लाल,हरा, पीला सभी रंगो का मतलब बता के उसका ज्ञान कराना ही संकेत सीखना है।

उद्दीपन परिवर्तन यह स्कीनर के सिद्धांत से संबंध रखता है।

जैसे - जैसे बालक के सामने क्रिया कर के उद्दीपक ला के सीखने के लिए प्रेरित किया जाता है।

सरल रेखा /श्रृंखला अधिगम यहां बालक को एक सरल रेखा में सिखाया जाता है। 

जैसे एक क्रम से गिनती, पहाड़ या कर्मानुसार या नियमानुसार बच्चों को गाड़ी सीखाना ही सरल रेखा में सीखना है। दरवाजा खोलना, तबला बजाना। 


शाब्दिक सहचर्य जहां बालक को उद्दीपक द्वार शब्दों का ज्ञान कराया जाता है। 

जैसे 'क' से कबूतर दिखा के 'क' का ज्ञा

KRISHN KAPOOR KMG

I am a writer. My First Book (Kalam A Pari) And second book (Pranay ki yatharthta). Village-Savargah, District-Ambedkar Nagar (Uttar Pradesh).

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