Krishn Kapoor Kmg
***चरित्र का महत्व***
यह लेख स्वयं लेखक द्वारा "श्री रामचरित मानस" का अध्ययन करने के पश्चात "चरित्र के महत्व" को बताने का प्रयास किया है। जो अध्ययन करने वालों के लिए अत्यंत लाभप्रद सिद्ध हुआ है। :-
चरित्र की दुनिया बहुत विस्तृत है, चरित्र का शाब्दिक अर्थ है सकारात्मक ढंग से जीवन जीना।
परंतु सकारात्मक ढंग किसे माना जाए क्योंकि मानव जीवन गुणों की ही प्रधानता के कारण सर्वोत्तम है।
प्राणी की पात्रता, योग्यता एवं क्षमताओं पर विश्वास करके ईश्वर ने उसे मानव जीवन प्रदान किया है, कि वह इसका सदुपयोग करेगा ना कि दुष्प्रयोग ।
मानव जीवन में ही चरित्र की प्रधानता होती है। चरित्र ही जीवन है और सात्विक ही एक चरित्र है।
चरित्र ही मानव जीवन को जीने लायक बना देती है । चरित्र से ही जीवन सार्थक बनता है। चरित्र ईश्वरीय रूप की एक मुख्य विशेषता है ।
चरित्र सभी दैवीय लक्षणों का प्रेरणा स्रोत है, चरित्र की चमक मनुष्य के ललाट पर परिलक्षित होता है ।
चरित्र एक चुंबकीय शक्ति है ,जो दूसरों को अपनी तरफ अनायास ही खींच लेती है । मानव जीवन में चरित्र, योग, संयम का विशेष महत्व है। चरित्र एवं संयम के बिना जीवन में संतुलन नहीं रहता, संतुलन के अभाव में जीवन सुनियोजित नहीं बनता,और सुनियोजित जीवन के बिना प्रगति संभव नहीं है।
जो जीवन प्रगतिशील नहीं होता है, वह मृतक के समान है । चिंतन का प्रभाव चरित्र पर पड़ता है , ईश्वरी चिंतन से मनुष्य का चरित्र बनता है और जब मनुष्य का चिंतन ईश्वरी होता है तब वह अच्छे काम करता है
अच्छे कामों से मानव का चरित्र बनता है । आदमी जब अच्छे काम , लालच व गलत भावना सोच लेता है तब उसका चरित्र खराब होने लगता है । अर्थात- चरित्रहीन व्यक्ति समाज में एक कलंक है और वह समाज में अपना मुंह दिखाने के काबिल नहीं रहता क्योंकि महापुरुष कह गए हैं -
कि दिन में ऐसा कोई भी कार्य ना करें जिससे रात को नींद ना आ सके और रात में भी ऐसा कोई कार्य नहीं करना चाहिए जिससे दिन में अपना मुंह न दिखा सके ।
जिस तरह मगरमच्छ मछली की शक्ति का आधार जल होता है और जल के बिना उसका जीवन व्यर्थ है उसी तरह मानव के शक्ति का आधार चरित्र होता है, और चरित्र के बिना मानव का जीवन जीना व्यर्थ है।
तप और पराक्रम का फल तो मिलता ही है ,लेकिन इसका सही लाभ वही मनुष्य उठा पाते हैं जो संयमी अर्थात समय के साथ चलने वाले और चरित्रवान एवं दूरदर्शी होते हैं। संयम तथा नियमों में बंधकर रहना ही तो जीवन है।
समाज में आदर्श जीवन व्यतीत करने के लिए सामाजिक नियमों का पालन करना मनुष्य का कर्तव्य है, क्योंकि लेख लिखने वाले ने कहा है -
कि शील आभूषणों का आभूषण होता है इसलिए शील स्त्री का सर्वोत्तम आभूषण है। सोने चांदी व हीरे के गहने पहनने से तन उतना सुशोभित नहीं होता जितना कि तन शील से सुशोभित होता है। वास्तव में दैवी संपदा के लक्षण शीलवान मानव में पाए जाते हैं।
लेखक ने कहा है की एक कुरूप चरित्रवान स्त्री चरित्रहीन रूपवान स्त्री की अपेक्षा कहीं अधिक सुंदर होती है । सौंदर्य चरित्र से परिलक्षित होता है,सौंदर्य का संबंध चरित्र व प्रतिभा से होता है न कि शरीर की बाहरी आकृति से।
महाकवि कालिदास व दार्शनिक सुकरात बहुत ही कुरूप है परंतु चरित्र व गुणों से वे उतने ही अधिक सौंदर्यवान थे जैसे कीचड़ में कमल की सुंदरता होती है।
क्योंकि कालिदास जी कह गए हैं -
शीलवान सबसे बड़ा, सब रतनन की खान।
तीन लोक की संपदा रही शील की आन।
बच्चों का चरित्र निर्माण उनके बचपन से ही शुरू किया जाना परम आवश्यक है। बच्चों के चरित्र निर्माण में माता-पिता तथा गुरुजनों का विशेष उत्तरदायित्व है और बच्चा आगे चलकर समाज को सुसंस्कृत बनाता है। अगर बच्चा को बचपन से ही समाज की सदाचार की बातें बताएं या बताने का प्रयास करें तो धरती पर स्वर्ग स्थापित हो सकता है ।क्योंकि महापुरुष कहते हैं-
जैसा सांचा होगा, वैसा खिलौना होगा ।
यदि मनुष्य अच्छा खिलौना बनाना चाहता है तो उसे अपने सांचे को भी अच्छा बनाना होगा। जन्म जन्मांतर से मानव में चरित्र का निर्माण होता रहा है । लेकिन मानव जैसा चरित्र बनाता है, वैसा दुनिया के सामने आता है। इस प्रकार बच्चों को संस्कारवान बनाकर चरित्रवान बनाया जा सकता है ।
माता-पिता तथा गुरुजनों का परम कर्तव्य है की वह बच्चों के चरित्र निर्माण में प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से सक्रिय भूमिका अदा करें क्यों कि कहा गया है पढ़ाई लिखाई करने से ऊंचे से ऊंचा पद तो प्राप्त कर सकते हैं; खूब धन भी कमा सकते हैं, परंतु बच्चे का उत्कृष्ट चरित्र निर्माण सुनिश्चित नहीं कर सकते। अच्छे चरित्र के बिना बच्चा अच्छा इंसान नहीं बन सकता।
पढ़ाई लिखाई के साथ-साथ बच्चों के अंदर विवेक और संवेदनशीलता जगाने की व दूसरे के दुख दर्द को अनुभव करके उसे समझने का प्रयास कर सकें।
मात्र पढ़ लिख लेने से आदमी बड़ा नहीं हो जाता , बल्कि आदमी बड़ा होता है अपने उज्जवल कर्म और सदाचार एवं सद्भावना से।
क्योंकि ये कहा गया है कि
पढ़े-लिखे कछु होत नहीं, बिन जाने निज भेद।
पढ़ लिख कर भी राक्षस रहा, रावण चारों वेद ।
अर्थात रावण चारों वेदों को पढ़ा था; वेदों के विद्वान माना जाता था, लेकिन मानसिक प्रवृत्तियों, चरित्रहीनता और नकारात्मक सोच ने रावण को निष्क्रिय बना दिया और आज भी उसे राक्षस ही कहा जाता है।
रत्नाकर बिल्कुल पढ़ा लिखा नहीं था वह जंगलों में राहगीरों से लूटपाट कर हत्या तक कर देने वाला खूंखार व्यक्ति था । एक दिन संत महात्माओं से मिलन हुआ और उनसे ही आत्मज्ञान प्राप्त हुआ निज भेद को जानकर जीवन को पढ़ा था इसलिए आज उन्हें महर्षि वाल्मीकि कहा जाता है।
चरित्रवान वह है जो सफलता असफलता के बावजूद ज्यों का त्यों बना रहता है । किसी समय किसी आंधी से डगमगाता नहीं ।
संत महात्मा गौतम बुद्ध जी कहते हैं -
संसार में कोई महापुरुष आकाश से उतर कर नहीं आता है और छोटा या तुच्छ व्यक्ति पाताल से नहीं आता है, अर्थात बल्कि मनुष्य अपने चरित्र से ही छोटा या बड़ा बनता है । हमारा हर विचार हर भावना हमारे क्षेत्र का अंग है।
जिस व्यक्ति के मन में गलत भावना , विचार आ जाता है चाहे वह क्षणिक ही क्यों ना हो लेकिन उसके शरीर में शिथिलता आ जाना स्वाभाविक है। और उसका साहस, पराक्रम ,तेज ,धर्म सब कुछ छूटने लगता है ।और बुद्धि छीड़ होने लगती है ।अर्थात शरीर में मानसिक शिथिलता होने लगती हैं जैसे -
उस रावण की हालात तो देखिए जो तीनों लोगों का राजा था उसके समान उस समय ना कोई धनवान था और ना ही कोई विद्वान और ना तेजस्वी था लेकिन उसके मन में जब सीता जी को चुराने का विचार आया फिर उसकी दशा देखिए -
जाके डर सुर असुर डेराहीं ।
निशि न नींद दिन अन्न न खाहीं।
सो दस सीस श्वान की नाई।
इत उत चितई चला भडिहाई ।
इमि कुपंथ पग देत खगेसा ।
रहा न तेज तन बुद्धि बल लेसा।
तुलसीदास द्वारा रचित श्री रामचरित्र मानस में (अरण्य कांड)
(27/08-40)
अर्थात जिस रावण के भय से सुर-असुर सभी डरते थे, वही सीताजी का हरण करने आता है तो सावधानी से कुत्ते की तरह इधर-उधर देखता हुआ चलता है उसकी इस जाल में उसकी भी भीरुता तथा बुद्धि बल व साहस का अभाव झलकता था।
इस समय विश्व में वैज्ञानिक अर्थशास्त्री, उद्यमी, धर्मशास्त्र, शिक्षक आदि बड़ी संख्या में मौजूद हैं ।परंतु विकास के इस नए युग में मानव के चरित्र का घोर पतन हो रहा है, जिस समाज का चरित्र नष्ट हो जाता है तो वह समाज ही नष्ट हो जाता है।
क्योंकि चरित्र व्यक्ति की अमूल्य निधि है चरित्र से ही आचरण का निर्माण होता है अतः हमें चरित्र की सुरक्षा हर हाल में करनी चाहिए चरित्र के बिना जीवन का कोई अर्थ नहीं है। चरित्रहीन का आत्मबल कमजोर होता है, उसके अंदर अपराध का बोध पनपता रहता है।
चरित्र निर्माण में संस्कारों का विशेष योगदान है ,चरित्रवान व्यक्ति से मिलकर विशेष आनंद की अनुभूति होती है। क्योंकि यह सही कहा गया है कि यदि हम अच्छे लोग की संगत करेंगे तो हमारे अंदर अच्छाइयां ही विकसित होंगी।
चरित्र से हम एक दूसरे की कद्र करते हैं, और दूसरे भी हमारे कद्र कहते हैं अर्थात कद्र ही चरित्र है। जहां से आदमी एक दूसरों का कद्र करना भूल जाता है वहीं से उसका समाज, उसका संसार नष्ट होना प्रारंभ हो जाता है। इसलिए हमें संसार में छोटा बड़ा सब का कद्र हर हाल में करना चाहिए कद्र से ही चरित्र बनता है।
चरित्र से जहां हमारा उत्थान होगा, वही हम अन्य लोगों के लिए भी प्रेरणा स्रोत बन सकेंगे।
सर्वप्रथम चरित्र निर्माण के लिए महापुरुषों का अनुसरण करना चाहिए और उसके सद्गुणों और आदर्श चरित्र के घटकों को अपने आचरण में लाना चाहिए ताकि हमारा चरित्र सरल योग्य शब्द, विचारों के साथ व्यतीत हो और जब हम स्वयं सुधरेंगे तभी दूसरों के लिए भी प्रेरणा बन सकेंगे।
दृढ़ता,सत्यनिष्ठा और साहस चरित्रवान व्यक्ति के आभूषण हैं। यह गुण जितने अधिक विकसित होते हैं, उतना ही हमारा चरित्र उत्कृष्ट होगा । जिसका चरित्र उत्तम है ; वह जीवन के हर क्षेत्र में सतत सफलता प्राप्त करता है। वह संसार में सिर उठाकर आनंदमय अवस्था में विचरण करता है।
इस दुनिया की दो ही रीत है हार और जीत , मानव के स्वभाव से ही हार और जीत होते हैं क्योंकि मानव एक ऐसा प्राणी है जो अपने अच्छे- बुरे कर्मों को दुनिया के सामने लाता है और अपने-अपने चरित्र से जीने मरने का मार्ग ढूंढ लेता है अर्थात हार उसी की होती है जिस के चरित्र में गलत भावना उत्पन्न होती हैं ,और जीत उसी की होती है जिसके चरित्र में सुविचार व सद्भावना होती है।
क्योंकि रामचरितमानस में अयोध्या में जब हाहाकार मच जाता है तो तुलसीदास जी कहते हैं -
धन्य जन्म जगतीतल तासू,
पितही प्रमोद चरित्र सुनी जासू।
चार पदारथ करतल ताके,
प्रिय पितु-मातु प्राण सम जाके।
इसमें तुलसीदास जी चरित्र का वर्णन करते समय कहते हैं कि इस संपूर्ण पृथ्वी तल पर उसका जन्म धन्य है जिसका चरित्र सुनकर पिता को आनंद मिले । धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पदार्थ उसकी हथेली पर है ,जिसको अपने माता-पिता प्राणों के समान प्यारे हैं। वह इस संसार में चरित्रवान है ,धनवान है ,बलवान है ,सदाचारवान है।
और संसार में जो बड़ों, माता-पिता, गुरुजनों के बताए हुए मार्ग पर नहीं चलता है वह संसार में ठोकरें खाता फिरता है। और संसार में उसकी हंसी उड़ाई जाती है। इस संसार में जिसके पास चरित्र सहनशीलता सदाचार की भावना नहीं है वह इस संपूर्ण संसार का एक कलंक है। उसको जिंदगी जीने की इस संसार में कोई जगह नहीं है जिसका चरित्र खराब हो गया।
लेकिन कुछ ऐसे मनुष्य होते हैं ;जो जिस जगह स्थान पर अपने चरित्र सदाचार को खो देते हैं तो उनका समाज गंदा हो जाता है, लेकिन वही मनुष्य जब दूर जाकर दुनिया के बारे में सोचता है और वहां अंजाना और चरित्रवान बनकर जिंदगी को व्यतीत करता है। पर जिसका चरित्र खराब है ही वे इस संसार के नाम पर कलंक है।
वही सर्वज्ञ है जो चरित्रवान है।
स्वभावशाली वही मानव है ,जो स्वयं अपराध करने पर भी किसी पर क्रोधित नहीं होते । अगर मानव सच्चा प्रेम करता है सच्चा आचरण बनाता है ,तो उसका प्रेम संसार में सबसे प्रिय हो जाता है ।और वह भी प्रिय हो जाता है ।और संसार का प्रेम, लगाओ ,लगन उसके हृदय में सद्भावना से पनपने लगते हैं।
जैसे (रामचरितमानस में 505 पेज के 214वाँ में दोहे ) में कहा गया है
मगबासी नर नारी सुनि, धाम काज तजि धाइ ।
देख स्वरूप स्नेह बस, मुदित जन्म फल पाइ।
जब भगवान राम 14 वर्ष के वनवास के बाद ग्राम में आते हैं तो वहां मार्ग में बसने वाले स्त्री पुरुष सुनते ही घर के कामों को छोड़कर राम के करीब उनसे मिलने के लिए उनका दर्शन करने के लिए आते हैं । वह सब प्रिय राम के वश में होकर उनके स्वरूप को देखते हैं, और अपने जन्म का फल पाकर प्रसन्न होते हैं क्योंकि राम का चरित्र उत्तम था, इसलिए उनको सब पुरुषोत्तम के नाम से पुकारते थे। वे एक सदाचारी,ब्रह्मचारी चरित्रवान व्यक्ति थे,जिनका व्यवहार और जिसका प्रेम चरित्र, आचरण अच्छा होता है वह मानव दुनिया में याद किया जाता है। और अपने मां-बाप के लिए सर्वश्रेष्ठ हो जाता है।
सुनी भूपाल भरत व्यवहारू ,
सोन सुगंधित सुधा शशि सारू ।
मूंदे सजल नयन पुलकेतन,
सुजस सराहन लगे मुदित मन।
अर्थात भरत जी का व्यवहार सुनकर राजा जनक ने उसे सोने में सुगंध और चंद्रमा का सर समझा उन्होंने अपने सजल नेत्र बंद कर लिए शरीर पुलकित हो गया और मन में प्रसन्न होकर भारत जी के सुयश को सराहने लगे क्योंकि भरत जी का व्यवहार अजर और अमर था। उनका चरित्र सद्विचार वाला था।
भरत चरित्र कीरति करतूती।
धर्मशील गुन विमल विभूती ।
समुझत सुनत सुखद सब काहू।
सुचि सुरसरिरू चिनिदर सुधाहू ।
अर्थात सबको भरत जी का चरित्र यस, कार्य,धर्म, शील,गुण और निर्मल विचार सुनने और समझने में सुखद है। यह गंगाजी की तरह पवित्र और स्वाद में अमृत का भी निरादर करने वाला है।
चरित्र मानव का एक ऐसा आभूषण है,जो मानव में सहनशीलता,सदाचार को प्रदान करता है। जब तक मानव संपूर्ण ब्रहमांड में शील का आभूषण पहने रहता है, तब तक वह इस संसार का सर्वश्रेष्ठ मानव बना रहता है।और जब मानव शील के वस्त्र को उतार कर फेंक देता है तब वह नष्ट हो जाता है। और इस दुनिया में अब उसका जीवन जीना बेकार है क्योंकि वह अपने बहुमूल्य वस्तुओं को नष्ट कर दिया है। लेकिन इस समय इस संपूर्ण संसार में अच्छे लोग भी अपने जीवन को व्यतीत कर रहे हैं और बुरे लोग भी लेकिन मानव जब किसी मानव से प्रेम लगा लेता है तो उसका चरित्र उस मानव के लिए अच्छा रहता है,लेकिन वह दोनों मानव के बीच में जो संपत्ति का आदान-प्रदान होता है तो मानव का चरित्र वहां से नष्ट होना प्रारंभ हो जाता है तो उन दोनों मानव के बीच जो घनिष्ठता थी वह घनिष्ठता अन्याय में बदल जाती है।
और दोनों लोगों की ज्ञान इंद्रियां शिथिल हो जाती हैं उन दोनों मानव के बीच के चरित्र खराब हो जाते हैं ।जब इस नजारे को दुनिया में पेश किया जाता है तो दुनिया में उन दोनों की हंसी उड़ाई जाती है। इस संपूर्ण संसार में मानव के ऊपर जब सुख-दुख आता है तो वह सुख-दुख उसके चरित्र के मुताबिक आती हैं ।
सहनशीलता एक बहुत बड़ा गुण है, जिस किसी के पास यह गुण है उसका जीवन सुखमय होता है। वह मनुष्य सद्गुरु की आशीशों का पात्र है। वह घर में हो या बाहर हो उसके ऊपर कितने भी इम्तहान इस दुनिया में आए वह सह लेता है कभी भी डगमग आता नहीं ।
इस कथा में लेखक कह गया है कि चरित्र से ही आपका व्यवहार बनता है और व्यवहार से रिश्ता बनता है और रिश्ते को बहुत संजोकर रखना पड़ता है नहीं तो वह भी नष्ट हो सकता है जैसा कि कहा गया है
रिश्ते भी मन की खेती में,गेहूं की तरह पकते हैं।
इनको ढंग से न संभालो तो रिश्तो में भी घुन लगते हैं
मानव के जीवन का पहला कर्तव्य चरित्र है, और पहला कदम भी।
हमारा चरित्र अच्छा है तो हर कोई अपना बन सकता है मगर प्यार भी हो और सत्कार भी हो और प्यार और सत्कार में मीठे पन का शामिल होना अति आवश्यक है । यदि बोल मीठे नहीं तो प्यार व सत्कार कहां हो पाएगा। अगर हम किसी को प्यार व सत्कार ना दे पाए तो सुख की कल्पना ही अधूरी ह बाणी अगर मृदुल नहीं तो अपने भी पराए हो जाते हैं। क्योंकि अगर पीछे मुड़ कर देखा जाए तो बड़ा पछतावा होता है कि हम अपने कड़वे वचनों द्वारा अनेकों लोगों का दिल दुखा चुके हैं अतः हमसे हमारे चरित्र भी खराब हो जाती हैं। और हमारा मान सम्मान भी नष्ट हो जाता है। इसलिए हमें अगर इस संपूर्ण धरातल पर जीवन को सुखमय,खुशहाल बनाना है तो मीठी वाणी का प्रयोग करना चाहिए साथ ही साथ चरित्र भी महान हो जाएगा और आप भी।
काम, क्रोध, लोभ, अहंकार, मोह यह मानव के चरित्र के वस्त्र से बहुत करीब होते हैं।और जैसे ही मानव अपने चरित्र रूपी वस्त्र को उतारकर फेंकता है तुरंत ही ऊपर दिए गए गए यह सब विनाशकारी वस्त्र मानव के शरीर पर हावी हो जाते हैं।
और यह मानव एवं मानव जीवन को नष्ट कर देता हैं। चरित्र किसी लिबासो का नाम नहीं है चरित्र किसी कर्मकांड का नाम नहीं है बल्कि जब मानव चरित्र के प्रति कदम उठाकर चरित्र की महानता देता है, तब वहां वह मानव चरित्रवान हो जाता है । इस संपूर्ण पृथ्वी पर कुछ ऐसी वस्तुएं को लेखक ने याद किया है जो खरीदी नहीं जा सकती और जिसकी कीमत बहुमूल्य होती है।और इसकी कोई मूल्य भी नहीं होती और इस संसार में जब से जीव का विकास हुआ और आज तक कोई इसको खरीद नहीं सकता
भूख, निष्ठा, ईश्वर, जीवन, सांसे,
सदाचार, चरित्र, शील, सहनशीलता,
मृत्यु को खरीद कर कोई रोक कर जीवन में नहीं बदल सकता।
इस संपूर्ण धरोहर पर मानव एक ऐसा ठिकाना बना कर रहता है कि उसका शरीर वहां भले न हो लेकिन उसके चरित्र के अनुसार उसका नाम वहां सदा के लिए रहता है। अर्थात प्रेम साहित्य की मूल प्रेरणा में से एक है। किसी रचनाकार का सृजन कार्य उसके अपने चरित्र और अनुभव से ही ऊपर जाता है फिर भी उसके रचनाओं में उनके चरित्र और अनुभव दिखते हैं। प्रेम, चरित्र, सदाचार, सील एक ऐसा शब्द है जिससे मानव का निर्माण एवं विकास होता है। चरित्र के हिसाब से मानव का विकास विनाश उनके हाथों में होता है ।चित्र मानव का सर्वश्रेष्ठ जीवन व्यतीत करने का एक ऐसा शब्द है जिससे मानव का जीवन बन जाता है। मेहनत और चरित्र से जो मिलता है, वह वस्तु सबसे कीमती है।
चरित्र हमारे आचरण से अद्भुत जीवन की महत्वपूर्ण उपलब्धि है। (अरस्तु)
चरित्र पेड़ की तरह है, और प्रतिष्ठा छाया है। हम जो सोचते हैं वह छाया है और जो वास्तविकता है वह चरित्र हैं। ( अब्राहम लिंकन)
किन्ही विशेषताओं के समूह को चरित्र कहते हैं। अर्थात व्यक्ति के व्यवहार की विशेषताएं जैसे नैतिकता,मानसिकता एवं मानसिक गुणों की सीमा चरित्र कहलाती है।चरित्र के आधार पर ही एक व्यक्ति दूसरे से भिन्नता लिए हुए कहा जा सकता है
( ऑक्सफोर्ड शब्दकोश )
चरित्र से तात्पर्य है मनुष्य का अनुशासित स्वभाव, मनोवैज्ञानिक प्रवृतियां एवं कर्तव्य के प्रति निष्ठा।
( वेबस्टर शब्दकोश)
व्यक्ति में किसी उद्देश्य की पूर्ति की क्षमता, धैर्य, दृढ़ निष्ठा के साथ पूर्ण करने की इच्छा ही चरित्र है। मनुष्य इच्छा शक्ति के अधीन संवेगों, भावनाओं, पर नियंत्रण कर मानवीय व्यवहार, एवं कार्यों को वांछित दिशा में निर्दिष्ट कर सकता है। इस प्रकार चरित्र मानवीय व्यवहारों का समूह है, जो किसी व्यक्ति द्वारा उसके स्वभाव, प्रकृति के अनुरूप जीवन में अर्जित किया जा सकता है। संसार में कोई भी महापुरुष आकाश से उतर कर नहीं आता है और छोटा मानव पाताल से नहीं आता है अर्थात मनुष्य अपने आचरण से ही छोटा बड़ा बनता है ( भगवान बुद्ध)
कृष्ण कपूर Kmg