Krishna kapoor kmg ki sabhi gazlen

गजल

(1)

तुमने हमे भुला दिया तो वफ़ा करें क्यूँ?
ऐ परी तुझपे भरोसा करें क्यूँ ?
तेरे दिए हुए जख्म आज भी हरे - भरे हैं ।
ये तेरी आखिरी निशानी है तो दवा करें क्यूँ ?
मतलब-मतलब निकल गया तो जाओ।
मुझे अपना माना नहीं तो गिला करें क्यूँ ?
ये आँखे भी ले जाते साथ अपने।
अब तुम्हारे तस्वीर को देखा करें क्यूँ ?
ढूंढ के मार क्यूँ न दें उन सारे रक़ीबो को ।
फ़क़्त दुनिया में पागलों सा टहला करें क्यूँ ?
ये दुनिया इब्तदाई से जानती है हम दोनों को।
अब विछड़ते वक़्त तुमसे झगड़ा करें क्यूँ?





     (2)

अब इश्क़ की राह में वो सफर नहीं आता।
जो जिगर हुआ करता था इधर नहीं आता।
भटक चुके हैं इस क़दर राहे इश्क़ में ,
वस्ल कैसे करें उनसे कोई रहबर नहीं आता।
अब कोई सुनता नहीं मेरे फिराक की सदाएं ,
अब तो अदावत करने भी हमसफ़र नहीं आता।
सब ए महताब में पढ़ लेता था रुखसार की आँखे ,
अब तो मेरी हालत बताने अहल ए नजर नहीं आता।
कितना बे नियाज़ी है मेरा चारासाज कपूर ,
वो दैर व हरम में भटकता है मेरे घर नहीं आता ।

वस्ल - मिलन,फिराक - दुःख, अदावत - दुश्मनी, 
शदा - आवाज़ बे नियाजी - बेपरवाह, दैर- मंदिर , हरम- मस्जिद



    (3)

तेरे जाने के बाद हम बिखर जाएंगे ।
पर आप मुझसे दूर किधर जाएंगे।
मेरे रास्ते मंजिल सवालात सब का हद है तूं,
अब तो जी में आता हद से गुजर जाएंगे।
हम कहते थे न ये कसमें वादे सब झूठे हैं ,
अगर सच होंगे तो हम आप भी मर जाएंगे।
मुझे लौटा दे वो मेरे सारे वादे हां ,
अब तो कसम खाने से भी मुकर जाएंगे।
तुम हमे छोड़ के जाओगी तन्हा करोगी ,
इससे पहले हम तुमसे बिछड़ जाएंगे।
अगर मैं मर के जी गया तुम्हारे इश्क़ में ,
तो आप मेरे जहन से भी उतर जाएंगे।


   (4)

एक मैं और एक तूँ एक तराना बन गया।
देख तुझे ही देखते ही मैं दीवाना बन गया ।
मुझे मालूम हुआ कल ये बादल मोहब्बत करता है,
जब तेरे धूप में निकलते ही शामियाना बन गया ।
ये आफताब ये महताब देख सब आ गए नीचे,
दीवाने ऐसे हो गए कि यहीं ठिकाना बन गया ।
मिली है मुझको वो शोहरत वो इज़्ज़त तुम्हे पाके,
जितने शय तूने छुए देख खज़ाना बन गया ।
तू ऐसी शम्मा है कि चाँद तारे भी रौशन होते है तुझसे ,
मैं भी चुराने के लिए कुछ नूर देख फरवाना बन गया।

  (5)

बिछड़ने वाले कभी-कभी तेरा ख्याल आता है ।
बिछड़ गए थे क्यूँ मुझसे यही सवाल आता है ?
मैं रोऊँ दर-बदर भटकूँ बताऊं सारी दुनिया को ,
मेरे जहन में बस एक तूँ ही मिसाल आता है ।
कभी मिलना तो करना लाखो सवालात ,
हम भी देखेंगे कि कितना सवाल आता है ?
ये दुनिया थपकियाँ दे कर मुझको सुला देती है ,
मेरे सोते ही मेरी धज़्ज़ियाँ उछाल आता है।
सुबह तूँ नहीं आती तो लगे थे खिड़की में जाले ,
शाम होते ही ये जाला कौन निकाल आता है ।
मैं देखना नहीं चाहता फिर भी देखने लगता हूँ ,
वो मंज़र ही कुछ इस कदर कमाल आता है ।
मैं उस दिन तेरा हो गया जिस दिन पता चला मुझे,
कि मेरी हर एक गलती तूँ दरिया में खंगाल आता है।

     (6)

इतने दिन कहां थे कुछ जवाब तो दे ?
है मोहब्बत कितना तुझको हिसाब तो दे ?
तेरे बगैर सब अँधेरा था अँधेरा ही रहा ,
ये जुगनूं ,चाँद सब फीके हैं आफताब तो दे ?
मैंने उम्र गुज़ार दी लिखने में इक कलाम तेरा ,
तूँ भी मुझको छोटी-मोटी किताब तो दे ।
क्या कहा - काबिलियत नही मुझमे तुझे समझने का ?
चंद लम्हों में समझ जाऊं मुझे शराब तो दे ।
सारी दुनिया ख्वाब देखता है तेरा ऐ रुखसार सुन ,
मैं भी खो जाऊँ तुझमे कुछ ऐसा ख्वाब तो दे।


    (7)

लोग राज पूछते हैं मेरे बदल जाने का ।
 टूट के बिख़र के सम्भल जाने का ।
अँधेरी रात में सहमा हुआ था ये अधूरा चाँद ,
मुझसे रास्ता पूछता है वीरान महल जाने का ।
शहर होता ही नहीं अब हमारे शहर में यारों ,
सूरज में नूर ही नहीं है अब उबल जाने का ।
फिर थक के मैंने कुछ जुगनुओं से दोस्ती कर ली ,
उनमे हुनर था बुझ के जल जाने का ।
वो आयी है अरसे बाद मुझसे मोहब्बत करने ,
कोई रास्ता बताए उसको निकल जाने का।



   (8)

कहाँ पे खो गया मेरा यार दीवार ओ दर से पूछते हैं?
वो खडी थी उस पर हम इधर से पूछते हैं।
बड़े अर्शे बाद आये थे उसके शहर में यारों ,
भटक गए गली में हम पता हर घर से पूछते हैं।
गुज़ार दी सारी जिंदगी इक तेरा दीदार करने में ,
हुआ था क्यों इश्क तुमसे ये उम्र भर से पूछते हैं?
मिल गई रास्ते में आखिर उसकी वालिदा मुझको ,
कहाँ पे रहती हैं रुखसार ये डर डर के पूछते हैं।
लगा ली फाँसी "कपूर" ने एक उनके रूठ जाने पर ,
वो मिलने तक नहीं आयी ये रात भर से पूछते हैं।

        (9)

 बड़ा शीरी है तेरे लफ़्ज़ों में एतबार कर लूं क्या ?
वो पहले वाली गलती फिर एक बार कर लूं क्या ?
बड़े बेचैन से रहते हो तुम सुना है आज कल ,
मैं भी अपने आप को बीमार कर लूं क्या ?
जैसे हुआ करता था पागल अब नहीं होता ,
फिर वही पागलपन सवार कर लूं क्या ?
ये इश्क़ है या जुआ समझ नहीं आता ,
कुछ तौर तरीके तुमसे मैं उधार कर लूं क्या ?
हमने तो सब कुछ लुटा दिया था एक बार तुम्हारे लिए
अब अपने ख़ाक को भी तार-तार कर लूं क्या?
हजारो आशिक़ की कतार लगी है दहलीज पे
तुम मेरी ही रहोगी ये खंज़र आर पार कर लूं क्या?


                     (10)

ज़िक्र तुम करना मिलने का जब थोड़ी रात हो जाएगी।
अब जरा छत पे आ जाना मुलाक़ात हो जाएगी ।
आवाज न देंगे हम तुमको न तुम बोलना मुझको ,
बस निगाहें हमसे मिलाना और हर बात हो जाएगी ।
लोग कहते हैं मोहल्ले में सब सूखा-सूखा है ,
कभी उधर भी निगाह फेर दो बरसात हो जाएगी ।
महताब नूर चुराता है मेरे रुखसार के रुख से,
छुप के बैठता है फ़लक में अभी जब रात हो जाएगी ।
नींद,चैन,लगाव सब कुछ खो गया उसके बिछड़ने पर।
कभी सोचा ही नहीं था ऐसी हालात हो जाएगी ।



                 (11)

कभी-कभी मुझे उसमे तो वफ़ा दिखता है ?
है अलग-थलग मुझसे फिर भी खुदा दिखता है ।
आज भी उसके दीदार से फना है लाखों बीमारी ,
मुझे तो रूह-रूह में उसके दवा दिखता है।
जाड़ा,गर्मी,वर्षा सब मौसम हैं कर्ज़दार उसके ,
सूरज-चाँद भी हैं कर्जदार वो क्या से क्या दिखता है ।
भरी बज़्म में वो आयी थी एक बार शाम के वक़्त,
क़ुरबत बहुत थीं उससे मगर वो जुदा दिखता है ।
एक दिन हार के,थक के कर ली ख़ुदकुशी "कपूर" ने ,
वो फिर भी रक़ीबो में मुफ्तला दिखता है।




               (12)

मोहब्बत के वशूलों को एक दिन तोड़ जाएंगे ।
मोहब्बत में हुए बर्बाद मोहबत छोड़ जाएंगे।
रह लेंगे दर-बदर कहीं पर रुसवाई में ?
मरेंगे उनके ही खातिर कफ़न भी ओढ़ जाएंगे।
बनाएंगे हमारे बाद गर वो ख्वाब किसी के साथ, 
भरी महफ़िल में उनके ख़्वाब का घर फ़ोड़ जाएंगे।
मेरे मर जाने के ही बाद वो आएगी मिलने मुझसे ,
मिलेंगे नहीं,मौत की गाड़ी को भी मोड़ जाएंगे।

                 (13)

वो कहते रहो जिगर के पास हां ये अच्छी बात है ।
करो न कभी किसी की आस हां ये अच्छी बात है ।
इश्क़ हो,लगाव हो या हो किसी से हिज़्र ,
मगर तुम बनना न देवदास हां ये अच्छी बात है ।
लगी है आग बस्ती में तो बुझा दो उसको मिलके सब,
पर कोई होये न बेलिबास हां ये अच्छी बात है। 
आना कभी महफ़िल में मेरे गले लगा लेंगे तुझको,
तुम मेरी हो रखो विश्वास हां ये अच्छी बात है ।
लगा दी बाज़ी "कपूर" अपने जान की एक दिन ,
तुमने भी माना मुझको ख़ास हां ये अच्छी बात है।






                   (14)

वो बचपन की बातें वो कैसी नादानी थी।
कुछ भी चाहे मिलता था कैसी मनमानी थी।
छोटी-मोटी,खट्टी-मीठी रात की वो लोरी ,
कभी माँ सुनाती तो कभी अपनी नानी थी।
मेले में लगाता था पूरे मेले की कीमत ,
पास कुछ नहीं बस पापा की खेती-किसानी थी।
जो भी मिलता था मुझको बाँट के खाता था सब में,
शायद यही आदत मुझमे खानदानी थी।
पचासों कागज़ की नावें 10-20 टायर की गाड़ियां ,
हम खुद बना रखे थे ये बचपन की कहानी थी।
पच्चीसों मेल का खेल मुझको याद था उस वक़्त ,
अक्कड-बक्कड़ बम्बे-बो तो मेरी जबानी थी ।
न जाते थे कभी पढ़ने मार खाने के डर से ,
गिल्ली-गोली बाग़ में खेलो अपनी मेज़बानी थी।

                    (15)

अब उससे कुछ कहने का मन नहीं है ,
 उसके साथ रहने का मन नहीं है ।
उसने मिटा डाली मेरी शान व शौक़त सब ,
इतना जुल्म सहने का मन नहीं है ।
डाल आया हूँ तेरा खत उस दूर दरिया में,
अब दरिया का बहने का मन नहीं है ।
पहले था लुटाता था जान तक उसपे ,
अब मेरा उसपे मरने का मन नहीं है ।
हर बार डरता "कपूर"उसके एक रूठ जाने से,
पर उससे अब डरने का मन नहीं है।


                  (16)

वो मुझको देखा और देख के दूर हो गया ।
वो शख्स मेरी आँखों का नूर हो गया ।
हां मिला तो था उससे चन्द लम्हों के लिए ,
पर न जाने कैसे इश्क भरपूर हो गया ?
हमको कोई नही जानता था उसके शहर में यारों ,
पर क़ातिल हमारी क़त्ल से मशहूर हो गया ।
हम पत्थर को मनाते-मनाते खुद पत्थर बन गये ,
पर देखो दो टके का शख्स कोहिनूर हो गया ।
लिखी थी जला डाली"कपूर"अपने इश्क की दास्ताँ,
जब वो ही मेरे ज़हन का फितूर हो गया।

                
             (17)

मुझे इश्क न हो खुदा करे।
न कोई मुझसे वफ़ा करे ।
मैं जीऊँ ले के जख्म हजार,
पर कोई न मेरी दवा करे।
न कोई करे मुझसे बातें ,
न किसी की बातें सुना करे।
हो जाए कुछ ऐसा हिज़्र उससे ,
न मिलने की कभी दुआ करे ।
हो इश्क फना मेरे दिल में ,
कुछ ऐसे दिल मेरा जला करे ।
तन्हाई में मेरी उम्र कटे ,
हम उम्र भर तन्हा रहा करे ।
मुझे इश्क पे हो न यकीं "कपूर",
न इश्क की बातें पढ़ा करे।


              (18)

अब तबाही देखो मेरे हिसाब से होगी ,
भरी हुई बज़्म में शराब से होगी ।
कोई भी न बच के जायेगा घर को ज़िंदा,
समझ के जान के नक़ाब से होगी ।
कुछ हसीनाएं जो मेरा दिल जीत ली हैं,
उन पर भी मेरी तबाही गुलाब से होगी ।
अँधेरे घर में जो कुछ लोग बांध के बैठे हैं चेहरा ,
उनका भी पर्दाफाश अब आफताब से होगी ।
"कपूर"अपने आप को गुनहगार बना दिया ,
इसका जिक्र यारो अब देखो शराब से होगी।


                  (19)

वो हमसे रूठ जाने का बहाना ढूंढ रहा है ।
रहेगा साथ नहीं मेरे ठिकाना ढूंढ रहा है ।
वो हमको छोड़ा ही छोड़ा शहर भी छोड़ के गया ,
जा के दूर कोई मंज़र सुहाना ढूंढ रहा है ।
उसको खुश देखने को हमने सांसे तक ठुकरा दी, 
सूना है मुझसे भी अच्छा दीवाना ढूंढ रहा है ।
सरयिक थीं सारी खुशियाँ हम दोनों के दरमियाँ,
मिल जाए उसको वही वक्त ज़माना ढूंढ रहा है ।
हुआ जब मेरे इश्क़ का असर उनपर सुनो "कपूर",
वो पागल होके दर-बदर पुराना ढूंढ रहा है।




                 ( 20)

दिल में जो जज्बा था वो जज्बात न रहा ।
पहले जो था अवक़ात वो अवक़ात न रहा ।
कभी खुशियों से बीत जाया करते थे दिन-रात ,
पर नशीब में शायद वो दिन रात न रहा ।
कितना भी बारिश हो तुमसे मिलने आता था ,
हाँ अब शहर में वो वाली बरसात न रहा ।
हमने घर,शहर,मुल्क एक दिन छोड़ दिया सब कुछ,
मेरे लायक शायद अब कोई हवालात न रहा ।
मुकम्मल हो गए होते तूम्हारे इश्क़ में "कपूर",
बस उस वक्त मेरी जुबाँ में वो बात न रहा।


              ( 21)

हुए खफा वो इस क़दर कि हम जिन्दा मर गए ।
हुए दफ़न हम गौर में वो अपने घर गए ।
गुज़र मेरा भी हुआ तेरे साथ ऐ रफ़ीक,
पर इस क़दर हुआ की खुद ही गुजर गए ।
तमाम उम्मींदे हजारों ख्वाहिशें सजाए थे तुम्हारे साथ,
वो पल गुजरा भी नहीं सब कुछ बिखर गए ।
ये कैसी मुलाक़ातें ये कैसी चाहत थी मेरी, 
हम खुद से न मिल सके कभी खुद से ही डर गए ।
वो बोले थे कि बना देंगे जिंदगी क़ीमती तेरी ,
पर क्या करें साहब वो जुबां से मुकर गए।





                       (22)

 मुश्किलें और भी बढ़ गयीं है उनसे दूर होकर ।
हम गैस खा खा के गिरते हैं मजबूर होकर।
सारी उम्र गुजार दी उसने मेरे इन बाहों में,
पर मेरे हाथ तक न लगी वो कोहिनूर होकर।
रिसाले बहुत छपे थे उसके खूबसूरती के बाजार में, 
सारा पासा पलट दिया उसने मशहूर हो कर ।
हाथ जब से छूटा उसका लकीरें मिट गयी मेरी ,
वो सारी बाज़ी जीत गया मुझसे दूर होकर ।
दो एक दिन ढूंढ के कपूर मैंने खुदकुशी कर ली ,
क्यों की वो जहन में छा गया था फितूर होकर ?


                   (23)

मामले सारे उसने मेरे नजरअंदाज कर दिए।
छोटी सी बात थी तो आगाज़ कर दिए।
बड़े करीब के रिश्ते थे पर दिल्लगी नही था ,
किस लफ्ज़ से उन्हें नवाजूं वो बे-अलफ़ाज़ कर दिए।
गुज़ारा था हमने हर इक लम्हा उन्ही के दरमियाँ ,
एक दिन गुस्से में चल गया तो आवाज़ कर दिए।
लगी थी भीड़ रकीबो की उनके दहलीज़ पर यारों,
लूटा दूं मैं जान उन पर मुझे मोहताज़ कर दिए।
मैं तो कुछ भी नहीं था उनके दीदार से पहले "कपूर",
उछाल के मेरी पगड़ी उसे सरताज़ कर दिए।




                     (24)

हमने बोल दी कुछ बात अब वो आता ही नहीं।
होगी कैसे मुलाक़ात अब वो आता ही नहीं।
शाम होते ही उससे होती थीं घंटो छत पे बात ,
अब किससे करेंगे बात अब वो आता ही नहीं।
एक उसको दिखाने को करता था लाखों कमाल,
पर अब क्या मेरी अवक़ात अब वो आता ही नहीं।
वो रूठा रहे या नफ़रत करे पर मेरा शहर न छोड़े,
करदे कोई गुज़ारिशात अब वो आता ही नहीं।
मैं रोऊँ दर-बदर भटकूँ तुम्हारे रूठ जाने पर ,
हो जाए और बत्तर हालात अब वो आता ही नहीं।
जिंदगी भी चाहती है कि मैं खुदकुशी करूं "कपूर",
तो हो जाए कोई हादशात अब वो आता ही नहीं।


                   (25)

कभी रुसवा होतें है तो कभी इज़हार करते हैं ।
न जाने किस गली में वो किससे प्यार करते हैं ।
दिलो पे ठेस लगता है यूं छोड़ जाना उनका,
जब वो किसी गैर की बातों पे एतबार करते है ।
कभी जाऊँ गर मैं उनके गलियों में अकेले ,
मैं देखता हूँ,सुनता हूँ वो छुप के मेरा दीदार करते हैं ।
ये इश्क़ गलती नहीं वजह है गुरबा की मेरे ,
पर वो भी कुछ गलतियां बार-बार करते हैं ।
न लौट के वो आयी मेरे इस चमन में,
हम पीरी के वक़्त में भी इंतज़ार करते हैं।


                 (26)

यूं रूठ कर कभी इस कदर न जाया कर ।
कमियां क्या थी वो भी बताया कर।
तुझे पता है मेरा हाल मैं बदतमीजी कर देता हूँ ,
तो तू भी जैसे चाहे मुझे सताया कर।
ये इश्क़ का जुआ है काबीलियत जरूरी नहीं ,
मैं खुश हो जाऊंगा बस ज़रा सा मुस्कराया कर ।
ये दुनिया क्या कहेगी तुझे ये सोचना बंद कर दे तूं ,
बड़ी तलब लगी है तेरी तूं मिलने आया कर ।
देख तेरे लिए सब कुछ छोड़ के आ गया "कपूर",
तकल्लुफ कुछ भी हो तुझे, मुझे सुनाया कर।


                  (27)

इतने सब्र किए हैं मेरे इम्तिहान को देखो ।
वक़्त खत्म हुआ अब शमसान को देखो ।
धुँआ इस कदर उठ रहा है हमारी चिता से यारो ,
गोया पूरी दुनिया जल रही हो वीरान को देखो ।
अदाकारी,मक्कारी,और गद्दारी से यहां ,
कैसे हुए फना सभी इंसान को देखो ।
इश्क़ तो सच्चा था तभी सब खो गए मेरे बाद ,
सारे फूल बिखर गए उस गुलदान को देखो ।
फना हो गया "कपूर"इश्क़ के दहलीज़ पे आके ,
सारे पन्ने उड़ गए मेरे दीवान को देखो।




                     (28)

मना करने पर भी करली मुलाक़ात एक दिन।
हमने तोफे में बेच दी औक़ात एक दिन ।
बहुत डरता था कि कहीं वो छोड़ न दे मुझे ,
देख ये भी हो गया हादशात एक दिन ।
थोड़ी सी जगह देदे अपने दिल में मुझे भी ,
फना हो गए हम करते गुजारिशात एक दिन।
ये गम ये दर्द ये हिज़्र जीते जी मार देगा मुझे ,
गौर पे करोगे तुम आंसू की बरसात एक दिन ।
जिक्र हर रोज होता था उसके शहर में मेरा ,
इस कदर बन गया मैं वाक़यात एक दिन।
कुछ खबर न चला मुझे बर्बाद हो गए "कपूर",
हो गयी बत्तर से भी बत्तर हालात एक दिन।


                    (29)

रह - रह के उसकी याद जहन में आता क्यूँ है?
ऐ खुदा वो एक ही शख्स मुझे भाता क्यूँ है ?
शहर में सब जानते हैं तूँ मेरी थी तूँ मेरी है,
तो करके उज्र लोगों से रुख छुपाता क्यूँ है ?
मेरी रुसवाई में तो तूँ भी सरयिक है रुखसार ,
मेरे किस्से मेरे यारों को सुनाता क्यूँ है ?
बिछड़ गए तुझ से हम अंधेरी रात में जाना ,
अब मेरे कब्र पे तूँ चराग़ जलाता क्यूँ है?
एक उम्र तुझे बुलाते - बुलाते बहरा हो गया मैं,
अब ये रोने - धोने जैसा शोर मचाता क्यूँ है ?
पास था उसके तो कभी पहचाना नहीं "कपूर",
अब तो दूर जा रहे हैं ये हाथ हिलाता क्यूँ है?
उज्र - बहाना


                   (30)

मेरे सारे दोस्त मुझे समझदार समझते हैं ।
मैं ठहरा मतलबी वो वफादार समझते हैं।
लुटा दी जान हमने जिन अजीज़ के लिए,
अब जा के वो हमको गद्दार समझते हैं।
गुफ्तगू संभल के करना वरना फैला भी सकता है,
जिसको हम अपने घर की दीवार समझते हैं।
शहर ए ख़ामोसा हो गया एक दिन मेरा दिल,
फिर भी हम उसको अपना दयार समझते हैं।
वफादारी का दावा क्यों करूं "कपूर" मैं,
वफादार हैं तो सब वफादार समझते हैं।

           शहर ए खामोसा - कब्रिस्तान
            दयार - घर
            अजीज़ - प्यारा 
   

                     (31)

नजर आने लगा हूं मैं जब से जमाने को ।
लोग कहने लगे हैं मुझको कमाने को।
कफ्स में देते हैं कुछ लोग परिंदो को दाना,
इतनी सादगी है तो क्यूं कहते नहीं उड़ाने को।
मुझको चलने दो अकेला है अभी सफ़र मेरा,
काफिला हो जाऊंगा गर सोचा गिराने को।
जिन दरख़्त के साए में हमने उम्र गुज़ार दी,
अब हमी से कहा जा रहा है उनको गिराने को।
जब तक रहा साथ कतरा कतरा बिखर गया, 
अब ना आना फिर तुम मुझको सजाने को ।
हमने खुद को क्या लिख दिया एक दिन हवाओं में ,
कयामत आने लगी मुझको मिटाने को ।
हमने उम्र भर जिस को रास्ता दिखाया "कपूर",
आज वही तुले हुए हैं मेरा रास्ता मिटाने को।


     32.
एक बार तुम मिलने का जिक्र तो करो ,
हमने दिल निकाल रखा है दीदार के लिए ।
वो तेरे कसमे वादे आज भी जिंदा है मेरे दिल में ,
कुछ फना हो गए कुछ धड़कते हैं एतबार के लिए ।
ये सबो रोज की कहानियों में उलझ गया हूं मैं 
नहीं तो खुद आ जाता मिलने अपने प्यार के लिए 
अभी तो कुछ अरसे ही गुजरे हैं मुलाकात के 
मिलना तो है चाहे उम्र गुजर जाए दीदार के लिए 
आज ही कुछ तन्हाइयों में रहने लगा "कपूर"
कुछ सपने थे जो मिट गए हैं रुखसार के लिए

KRISHN KAPOOR KMG

I am a writer. My First Book (Kalam A Pari) And second book (Pranay ki yatharthta). Village-Savargah, District-Ambedkar Nagar (Uttar Pradesh).

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