manovigyana ki mantra


मनोविज्ञान की मंत्रा 

मनोविज्ञान शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम रुडोल्फ गोलकॉय ने 1590 ई0 में अपनी पुस्तक 'साइकोलॉजिया' में किया।

मनोविज्ञान के जनक अरस्तु कहलाते है । और मनोविज्ञान की जननी दर्शनशस्त्र है।


मनोविज्ञान का शाब्दिक अर्थ: 


पोम्मोनॉजी के अनुसार:- 

मनोविज्ञान –  मन + विज्ञान = वह विज्ञान जिसके द्वारा मन और विभिन्न पहलुओं एवं व्यवहारों का अध्ययन किया जा सकें। मनोविज्ञान शब्द Psychology का हिंदी रूपांतरण है ।


गैरेट के अनुसार:-

साइकोलॉजी (Psychology) शब्द ग्रीक भाषा के 'Psyche' साइकी और Logos लोगोस से मिलकर बना है। Psyche शब्द का अर्थ " आत्मा " और Logos का अर्थ होता है “ अध्ययन " अतः साइकोलॉजी  का शाब्दिक अर्थ है, " आत्मा का अध्ययन या आत्मा का विज्ञान ।"

साधारण/संकीर्ण अर्थ :- मनोविज्ञान मन का विज्ञान है, जिसमे मन का अध्ययन किया जाता है।

                 (अथवा)

जिसमे व्यवहार व अनुभूति का अध्ययन करते है या उसके अंदर परिवर्तन करते हैं।

*इसमें सिर्फ मानव व्यवहार का ही अध्ययन नहीं करते हैं , अपितु मानव तथा पशुओं दोनो के व्यवहार का अध्ययन किया जाता है। इसलिए इसे व्यावहारिक विज्ञान या विधायक विज्ञान भी कहते हैं।


सही या शुद्ध अर्थ :- मनोविज्ञान एक ऐसा विज्ञान है जो प्राणियों के व्यवहार एवं मानसिक तथा दैहिक प्रक्रियाओं का अध्ययन करता है। मनोविज्ञान शब्द का शाब्दिक अर्थ है 'मन का विज्ञान' अर्थात मनोविज्ञान अध्ययन की वह शाखा है जो मन का अध्ययन करती है।


एबिंगहास के अनुसार :- “मनोविज्ञान का अतीत (भूतकाल) अत्यंत लंबा है लेकिन इतिहास काफी छोटा है।”


मनोविज्ञान को अंग्रेजी में साइकोलॉजी कहते हैं साइकोलॉजी शब्द की उत्पत्ति ग्रीक/यूनान भाषा के दो शब्द psyche + logos से मिलकर हुई है। जिसने  psyche साइकी शब्द का अर्थ  आत्मा (soul)/विज्ञान (science)/ज्ञान(knowledge) से है । अतः अंग्रेजी शब्द साइकोलॉजी का शाब्दिक अर्थ है -”आत्मा का अध्ययन” या “आत्मा का ज्ञान”।

(परीक्षाओ में अगर ग्रीक या  यूनान शब्द ना हो तो लैटिन भाषा सही होगा।)


   Psychology 


Psyche              यूनानी शब्द            Logos 

Soul आत्मा                             विज्ञान/ज्ञान /अध्यन 

Physical Body  +          mind 

       शरीर।          +            मन 

इसी को हम कह सकते हैं कि इसमें मानसिक तथा दैहिक,शारीरिक अध्ययन करने को मनोविज्ञान कहा जाता हैं।


Physical Body + Mind :-  पहले के मनोविज्ञानिक ये 

चिंतन करते थे कि हमारे पास एक भौतिक शरीर है, पर हमारा जो व्यवहार है जो हम अपने व्यवहार से एक दूसरे को प्रभावित कर देते हैं तो उसकी उत्पत्ति कहां से होती है? अर्थात व्यवहार की उत्पत्ति कहां से होती है। अगर शरीर के बाहर कोई जगह है तो इसको अर्थात इस व्यवहार को प्रभावित करने वाले कौन-कौन से कारक हैं। अगर अंदर है तो इस व्यवहार के उत्पत्ति का केंद्र कहां है ? क्या है ?कौन सा अंग है जो इसको कंट्रोल करता है शरीर और मन कहां किस तरह जाकर जुड़े हैं ; जिससे एक दूसरे को प्रभावित करके समाज में प्रदर्शित करते हैं, अर्थात  शारीर और मन  का अध्ययन करना भी मनोविज्ञान है।


मनोविज्ञान की परिभाषा 

1 वाटसन के अनुसार :- मनोविज्ञान, व्यवहार का निश्चित या शुद्ध विज्ञान है।


2 मैक्डूगल के अनुसार :- मनोविज्ञान, आचरण एवं व्यवहार का यथार्थ विज्ञान है।


3 वुडवर्थ के अनुसार :- मनोविज्ञान, वातावरण के सम्पर्क में होने वाले मानव व्यवहारों का विज्ञान है।


4 क्रो एण्ड क्रो के अनुसार :- मनोविज्ञान मानव–व्यवहार और मानव सम्बन्धों का अध्ययन है।


5 बोरिंग के अनुसार :- मनोविज्ञान मानव प्रकृति का अध्ययन है।


6 स्किनर के अनुसार :- मनोविज्ञान, व्यवहार और अनुभव का विज्ञान है।


7 मन के अनुसार :- आधुनिक मनोविज्ञान का सम्बन्ध व्यवहार की वैज्ञानिक खोज से है।


8 गैरिसन व अन्य के अनुसार :- मनोविज्ञान का सम्बन्ध प्रत्यक्ष मानव-व्यवहार से है।


9 गार्डनर मर्फी के अनुसार :- मनोविज्ञान वह विज्ञान है, जो जीवित व्यक्तियों का उनके वातावरण के प्रति अनुक्रियाओं का अध्ययन करता है।


10 मार्गन के अनुसर :- मनोविज्ञान मानव और पशु व्यवहार का विज्ञान है। 

          

            मनोविज्ञान का इतिहास 

जब हम मनोविज्ञान के इतिहास की बात करते हैं ; तो सबसे पहले हमें आत्मा का विज्ञान , मन का विज्ञान, चेतना का विज्ञान , एवम व्यवहार के विज्ञान को पढ़ाया जाता है या हम खुद पढ़ते हैं। किंतु कई बार पढ़ने - पढ़ाने के बाद भी हमारे मन में एक संदेह अवश्य बना रहता है कि इसमें आत्मा और चेतना अमूर्त है तो विज्ञान कैसे हो सकता है। या फिर कभी हम पढ़ तो लेते है किंतु मनोविज्ञान और मनोविज्ञान के इतिहास को ले के हमारे मन में कोई भी प्रश्न उत्पन्न ही नहीं होता है। बस जैसे को तैसे पढ़ लेते हैं।

मनोविज्ञान के इतिहास को पढ़ने से पहले हम जान लेते हैं कि विज्ञान क्या है फिर इसके इतिहास को विज्ञान कहने का संपूर्ण संदेह ही दूर हो जाएगा।

अगर आप सभी अध्ययन करने वालों से हम प्रश्न करें कि विज्ञान किसे कहते हैं तो आप सभी में से 95% पाठकों को वही पुरानी रटी-रटाई परिभाषा याद आ जाती है कि “सु संगठित सु व्यवस्थित क्रमबद्ध ज्ञान को विज्ञान कहते हैं।”

मैं इस परिभाषा का अनुसरण करता हूं और मैं इसमें लिखित तीनों बातों से सहमत भी हूं । किंतु पूर्ण रूप से यह परिभाषा विज्ञान को परिभाषित करने में सक्षम नहीं है, जिसके माध्यम से हम आपको मनोविज्ञान की ऐतिहासिक क्रम को ठीक से विवेचित कर सकें।


तो आइए हम यह जानते हैं विज्ञान क्या है? और मनोविज्ञान के इस इतिहास को समझने के लिए किस प्रकार के विज्ञान के प्रकृति और परिभाषा तथा प्रकार की आवश्यकता पड़ती है।



विज्ञान क्या है :- 


संकीर्ण अर्थों में:- जो तर्क पर सिद्ध हो, जो मूर्त हो, जिसको प्रयोग में लिया जा सके , जिसका विश्लेषण और संश्लेषण किया जा सके, जिसमें विश्वसनीयता पाई जाती हो , जो वैध हो तथा साथ ही साथ पुनरुत्पादकता की क्षमता हो या पुनरुत्पादक के गुण सामिल हो वह विज्ञान है।


विज्ञान के प्रकार:-

(i) शुद्ध विज्ञान                 (ii) व्यवहारिक विज्ञान


(अगर शुद्ध विज्ञान आपको समझ में आ गया तो व्यावहारिक विज्ञान आप स्वयं जान जायेंगे।)


1 शुद्ध विज्ञान:-  यह वह विज्ञान है जिसके अंतर्गत आप उसके प्रयोगो,नियमों, सिद्धांतों को किसी भी परिस्थिति में कहीं भी लागू करेंगे तो आपको उसका 100% परिणाम प्राप्त होगा ना कि 99.9% पूरा 100% ही प्राप्त होगा।

जैसे भौतिक, रसायन,गणित आदि विज्ञानों के प्रयोग सिद्धांतों को आप लागू करके देख सकते हैं ।


तो आइए पहले गणित को देखते हैं।

2 + 2 आप किसी भी परिस्थिति में कहीं भी किसी भी वस्तु के साथ लागू करके देखिए 4 ही प्राप्त होगा अर्थात 100% परिणाम प्राप्त होगा।


भौतिक विज्ञान:-  न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण का प्रयोग का 100% परिणाम प्राप्त हुआ क्योंकि यह शुद्ध विज्ञान है।

रसायन विज्ञान:- आप पानी में सोडियम डालिए आग लग जाएगी या कोई रिएक्शन कर के देखिए, जैसे h2o = h के 1 अणु और ऑक्सीजन के 2 अणु मिलकर पानी ही बनेगा। आप प्रयोग किसी भी परिस्थिति में करेंगे तो आपको इसका 100% परिणाम ही प्राप्त होगा ।

 (बाकी बायोलॉजी के परिणाम से आप सब परिचित ही हैं अब इसके प्रयोग को क्या बताना है।)


2 व्यवहारिक विज्ञान:- इसके नियम सिद्धांत लागू करेंगे तो 100% परिणाम प्राप्त ही नहीं होंगा ।

हां 100% परिणाम प्राप्त हो या ना हो परन्तु एक अच्छा परिणाम जरूर प्राप्त होता है।


आप कहेंगे कि जब 100% परिणाम प्राप्त नहीं हो रहा है तो कैसे विज्ञान होगा ये ।


क्योंकि यह प्रयोग पशुओं और मानव दोनों पर किया जाता है अर्थात मानव और पशुओं के व्यवहार को जानने के लिए इसका प्रयोग करते हैं।


नोट:- मानव व्यवहार एक जैसा है ही नहीं हर पल हर क्षण बदलता रहता है तो परिणाम कैसे 100% प्राप्त होगा। यहां मानव पहले से मानव से हर एक मायने में अलग है तो व्यवहार कैसे एक जैसे रह सकता है जैसे शारीरिक,संवेगात्मक, मानसिक, व्यक्तिक भिन्नता, नैतिक संरचना, हर एक रूप से अलग है।


यहां प्रत्येक व्यक्ति भावना, संवेग, आदि उपर्युक्त 

भिन्नता के कारण भिन्न-भिन्न है जिसके कारण व्यवहार में भिन्नता पाई जाती है तथा 100% परिणाम प्राप्त नहीं होता है किंतु एक अच्छा परिणाम जरूर प्राप्त होता है।


विज्ञान क्या है अगर इसके कुछ प्रमाण को विस्तृत रूप से जान लेते हैं। तो  फिर मनोविज्ञान क्या है इसको समझने में किसी भी प्रकार की कोई बाधा नहीं रह जायेगी।


1 Objectivity (वस्तुनिष्ठता):-   (वस्तु का वह गुण जो निष्ठावान हो जो बदले ना )

( किन्तु मानव व्यवहार एक जैसा नहीं है।) किसी विचार या चिन्तन की प्रक्रिया में अपने जीवनमूल्यों, हितों, पूर्वाग्रहों, कल्पना और मान्यता से परे तर्कों, तथ्यों और प्रमाणों को आधार मानना ही वस्तुनिष्ठता है।

दर्शन के सन्दर्भ में, किसी विचार या चिन्तन की प्रक्रिया में अपने जीवनमूल्यों, हितों, पूर्वाग्रहों, कल्पना और मान्यता से परे तर्कों, तथ्यों एवं प्रमाणों को आधार मानना, वस्तुनिष्ठता (objectivity) है।

जैसे:- एक सोने या चाँदी की बनी हुई वस्तु को आप लीजिए । आप उसको किसी भी प्रकार से देखेंगे वह जो हमारे पास जैसे था वैसे दूसरों के पास भी रहेगा। चाहे उसके रंग,वजन,प्रकार,बनावट इसके मान में कोई परिवर्तन नहीं पाया जाएगा।

चाहे किसी देश काल खंड में इसको ले जाएंगे इसके मान में कोई परिवर्तन नहीं होगा।

जैसे :- सोना,चांदी, आदि 

2 Reliability (विश्वस्यनीयता):- 

सतत् व्यवहार:-(एक जैसा व्यवहार)

किसी चीज़ के अच्छे से काम करने या व्यवहार करने से भरोसा या विश्वास पाने की गुणवत्ता.


जो व्यवहार बार-बार हो रहा हो किंतु उसके व्यवहार में कोई परिवर्तन न हो तो जाहिर सी बात है विश्वसनीयता आ ही जाएगी।

जैसे:- सोडियम को पानी में कितनी भी बार डालोगे उसमें आग लग ही जाएगा । वह अपने व्यवहार में परिवर्तन नहीं लाता, प्रत्येक बार वह अपने गुण को प्रदर्शित करेगा।


3 Validity वैधता:-

वह डिग्री है जिससे वह उस चीज को मापता है जिसे मापने की अपेक्षा की जाती है। यह विश्वसनीयता के समान नहीं है, जो कि वह सीमा है जिससे कोई माप ऐसे परिणाम देता है जो बहुत सुसंगत होते हैं। वैधता के भीतर, माप को हमेशा समान होने की आवश्यकता नहीं होती है, जैसा कि विश्वसनीयता में होता है।

जैसे किसी को पेट में दर्द है तो कहां जाएगा:- मास्टर या डॉक्टर या फिर वकील उत्तर - डॉक्टर 

यदि आप किसी झगड़ा या कानूनी कार्यवाही मुकदमा वगैरह में फैंसेते हैं तो किसके पास जाएंगे वकील,डॉक्टर, मास्टर, उत्तर-वकील 

अगर किसी मरीज को टाइफाइड बुखार हुआ हो तो वह डॉक्टर दावा करता है कि मेरे द्वारा दी गई दवा को यदि आप 21 दिन तक खाओगे तो ठीक हो जाओगे 

मैं दावा करता हूं। यही दावा करना ही वैलिडिटी है।


वकील भी मुकदमे का यह दावा करता है कि यदि आप  इतनी तारीख देखेंगे तो इसके बाद इसको सुलह समझौता या खत्म करवा देंगे या खत्म हो जाएगी। 

यह दावा करना ही वैलिडिटी है। 


वैलिडिटी की बात हम करें तो इससे पहले पाठकों के मन में रिचार्ज वाली वैलिडिटी का तस्वीर छप जाता है।

तो रिचार्ज की बात अगर करें तो वह कंपनी के अनुसार एक वैधता देता है कि मैं आपको ₹299 के रिचार्ज में पूरे 28 दिन फ्री बात या 100 मैसेज फ्री देने का वादा करता हूं जो 28 दिन बाद समाप्त हो जाएगा यही दावा करना ही वैलिडिटी है।


4 Standed procedure मानक प्रक्रिया 

किसी खास काम को करने के लिए लिखित दिशा-निर्देशों का एक सेट. यह एक आंतरिक दस्तावेज़ होता है, जिसमें किसी प्रक्रिया को पूरा करने का तरीका और उससे जुड़ी दूसरी जानकारी होती है. कंपनियां, अपनी सेवाओं को देते समय गुणवत्ता, स्थिरता, और सटीकता सुनिश्चित करने के लिए एसओपी तैयार करती हैं. एसओपी के फ़ायदे ये हैं: त्रुटियों में कमी, दक्षता में बढ़ोतरी, लाभप्रदता में बढ़ोतरी, सुरक्षित काम करने का माहौल, समस्याओं को सुलझाने और बाधाओं को दूर करने में मदद.


रॉबर्ट गेने का अधिगम का सिद्धांत एक अच्छा उदाहरण है।

हलवा या रोटी सब्जी बनाने का सही तरीका या मानक प्रक्रिया।

घी, तेल, जीरा ,सूजी, भूनना, चीनी, पानी, आदि जैसे नियम का पालन करके आप हलवा बना सकते हैं यदि इसके विपरीत करेंगे तो हवा नहीं बनेगा।


उदाहरण :- किसी बच्चे को पहले वर्णमाला फिर शब्द फिर वाक्य पढ़ना लिखना बताएं जीन पियाजे के संज्ञानात्मक चरण का उदाहरण की कोई चरण एक दूसरे पर फिट नहीं होगा और उल्टा सीधा आप नहीं कर सकते हैं।

5 Reproducibility पुनरुत्पादन

यह विज्ञान के लिए सबसे महत्वपूर्ण है।

किसी जीव के रूप में अपनी तरह के और अधिक जीव पैदा करना ही पुनरुत्पादन है।

जैसे जीन पियाजे का सिद्धांत कोई भी पड़ेगा अध्ययन करेगा और पुस्तक, नोट निकलेगा तो उनके संज्ञानात्मक चरण एक ही क्रम में ही बतायेगा जो क्रमानुसार है।

किंतु अगर कोई उनके चरण को इधर-उधर बता दिया किसी पुस्तक में तो यह गलत अध्ययन किया होगा या कोई प्रॉब्लम होगी उसके पुनरुत्पादन में ।

जैसे अगर हम बच्चा पैदा करेंगे तो इंसान ही होगा  कोई जानवर तो नहीं रहेगा और जानवर इंसान नहीं पैदा कर देगा। 


6 मूर्त :

स्पर्श किए जाने योग्य, भौतिक, या ठोस. मूर्त वस्तुओं को देखा, छुआ, और मापा जा सकता है. मूर्त संपत्तियों के कुछ उदाहरण ये हैं:

अचल संपत्तियां, संपत्ति, संयंत्र, और उपकरण, वाहन, इन्वेंटरी, भूमि, नकदी. 

मूर्त संपत्तियों को देखा और महसूस किया जा सकता है. इन्हें आग, प्राकृतिक आपदा, या दुर्घटना से नुकसान पहुंच सकता है. मूर्त संपत्तियों का मूल्यांकन आसानी से किया जा सकता है. इन्हें संपत्ति, संयंत्र, और उपकरण (पीपीई) के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है

7 तर्कशील :

तर्कों के माध्यम से जो सिद्ध हुआ हो उसे ही तर्कशील कहते हैं।

8 प्रयोग में लिया जाए : 

विज्ञान के क्षेत्रों में जिसका प्रयोग किया गया हो और जो सही या शुद्ध साबित हुआ हो।उसे ही प्रायोग में लेने की प्रक्रिया कहते है।

9 विश्लेषण:  किसी चीज़ को उसके घटक भागों में तोड़कर उसका अध्ययन करना ही विश्लेषण है।

विश्लेषण करने से किसी चीज़ की वास्तविक प्रकृति या आंतरिक संबंधों का पता चलता है।


10 संश्लेषण:  उलटी प्रक्रिया को “संश्लेषण” कहा जाता है।

संश्लेषण तत्वों को मिलाकर कुछ नया बनाने की क्रिया है।










  









आत्मा का मनोविज्ञान


एबिंगहास के अनुसार :- 

“मनोविज्ञान का भूतकाल बहुत लम्बा है लेकिन इतिहास बहुत छोटा है।”


470 BC :- में सुकरात का जन्म हुआ ।  यह यूनान/ग्रीक का दार्शनिक था।

  • मनुष्य को मनुष्य का अध्ययन करना चाहिए। (सुकरात)

  • दर्शनशास्त्र का मतलब तर्क देना है ।

  • सुकरात ने अपने पूरे जीवन में कोई भी पुस्तक नहीं लिखी और यह कहा है कि - 

(ज्ञान ही गुण है और गुण ही ज्ञान है।)

428 BC :- एथेंस/यूनान/ग्रीक में प्लेटो का जन्म हुआ जो सुकरात का शिष्य था।

  • ईश्वर प्रकृति  एवं मनुष्य आपस में जुड़े हैं (प्लेटो)

  • प्लेटो ने एक पुस्तक लिखी Republicऔर इसमें कहा कि मनुष्य में आत्मा पाई जाती हैं।


384 BC से 322 BC :- में अरस्तु आए जो प्लेटो के शिष्य थे। अरस्तु ने दर्शनशास्त्र में आत्मा का अध्ययन शुरू किया इसीलिए मनोविज्ञान का आदिजनक अरस्तु को कहा जाने लगा।

  • पर यहां भी एक मनोवैज्ञानिक है कॉलसेनिक जिनको अरस्तु को मनोविज्ञान का आदिजनक कहा जाना अच्छा नहीं लगा और कहा की प्लेटों ने तो अरस्तु से पहले ही कह दिया है कि मनुष्य में आत्मा पाई जाती है। इसलिए मनोविज्ञान का जनक तो प्लेटो को कहा जाना चाहिए इसलिए सिर्फ कॉलसेनिक के अनुसार प्लेटो को मनोविज्ञान का आदिजनक माना  गया है।

अभी भी दर्शनशास्त्र के अंदर ही मनोविज्ञान है बाहर नहीं निकला है निकालने के लिए मचल रहा है

अरस्तु के बाद 16वीं शताब्दी तक दर्शनशास्त्र का अंधकार का युग चला तो मनोविज्ञान का जन्म संभव ही नहीं था। फिर कैसे मनोविज्ञान बाहर निकले जब दर्शनशास्त्र अर्थात मनोविज्ञान की जननी खुद अंधकार में थी।


16वीं शताब्दी में फिर आत्मा का विज्ञान अर्थात मनोविज्ञान अस्तित्व में धीरे-धीरे आने लगा और मनोविज्ञान की बात होने लगी। 1590 में रुडोल्फ गोलकॉय ने  साइकोलॉजीया नामक  एक पुस्तक लिखी जिसमें 1590 में सर्वप्रथम आत्मा को साइकोलॉजी शब्द से प्रयोग किया अर्थात मनोविज्ञान या साइकोलॉजी शब्द पहले देने वाले मनोवैज्ञानिक रुडोल्फ गोलकॉय हैं।

16वीं शताब्दी :- डेकार्टे आते हैं जो बात अरस्तु प्लाटों ने आत्मा की अध्ययन की कही थी वही बात पुनः डेकार्टे ने भी कहा और आत्मा के अध्ययन को भौतिक शास्त्र से जोड़ने का प्रयास किया किंतु बहुत सारे मनोवैज्ञानिक ने कब ,क्यों ,कहां, कैसे, क्या जैसे प्रश्न करके डेकार्टे का विरोध किया और इस मान्यता को खारिज करवा दिया।

विरोधकर्ता:- जॉनलॉक, हाब्स, लाइबनीज, इमैनुअलकांट, रूसो आदि।

बाकी इस मान्यता के खारिज होने का कारण था कि यह विज्ञान के नियमों, सिद्धांतो के अनुसार खरा नहीं उतर पाया।

17वीं शताब्दी मन / मस्तिष्क का विज्ञान :-मन और मस्तिष्क की इस धारणा को पोम्पोनॉजी ने दिया ।

नोट:- आत्मा के विज्ञान के विरोधकर्ता इत्यादि ने मन और मस्तिष्क में अंतर न निकाल पाए इसी कारण इसे भी खारिज कर दिया गया । बाकी विज्ञान के नियमों का सही पालन न होने के वजह से प्रश्न एवम तर्क करके खारिज कर दिया गया । 

विरोधकर्ता :- विलियम जेम्स , विलियम वुंट, वाइब्स, जेम्स सली इत्यादि।


19वीं शताब्दी चेतना का विज्ञान:- 

चेतना के विज्ञान का समर्थक विलियम जेम्स, सली,टीचर, विलियम वुंट, वाइव्स आदि थे।

19वीं शताब्दी 1852 में विलियम जेम्स ने 1852 से 1870 तक संघर्ष किया और फिर मनोविज्ञान को दर्शनशास्त्र से अलग कर दिया। इसलिए जेम्स को अमेरिका के आधुनिक मनोविज्ञान का जनक माना गया। मनोविज्ञान को दर्शनशास्त्र से अलग करने की आधारशिला उनकी पुस्तक प्रिंसिपल ऑफ साइकोलॉजी बनी। जो 1895 में प्रकाशित हुई और यह मनोविज्ञान की पहली प्रमाणित पुस्तक मानी जाती है । विश्व स्तर पर आधुनिक मनोविज्ञान का जनक विलियम  वुंट है।


अब यहां भी खंडन करने वाले आ गए


खिलाफ मनोविज्ञानिक “मैग्डूगल” 

इसने एक पुस्तक लिखी “द आउटलाइन ऑफ साइकोलॉजीइस पुस्तक के 16वें पेज पर इसने चेतन को बुरा शब्द बेकार शब्द , कह दिया। जिससे 1905 में चेतना के विज्ञान का अस्तित्व धीरे-धीरे खत्म होने लगा।

सिगमंड फ्रायड 1913 मैं मनोविश्लेषणात्मक सिद्धांत दिया  हमारे शरीर में जब 10% ही चेतन मन है,  तो सिर्फ 10% अर्थात चेतन अवस्था का अध्ययन करने से काम कैसे चलेगा । कार्य पूर्ण तो तब होगा जब तीनों का सामान अध्ययन किया जाएगा , इसलिए  इसकी मान्यता भी खारिज हो गई।

मैं बोलूं आप अपना उंगली काट लो तो नहीं कटेंगे क्योंकि आप चेतन अवस्था में हैं केवल चेतना के आधार पर मनोविज्ञान का अध्ययन नहीं होता है।

फिर पुनः 20वीं शताब्दी में सभी मनोवैज्ञानिकों की मीटिंग हुई इसमें वाटसन खड़े हुए तो मनोविज्ञान को व्यवहार का विज्ञान माना।

समर्थनकर्ता :- थार्नडाइक, स्कीनर और मैग्डुगल,मर्फी गार्डनर, बोरिंग, क्रो एंड क्रो, कॉलसेनिक आदि हैं।

मनोविज्ञान को व्यवहार का विज्ञान या धनात्मक व्यवहार, नियामक व्यवहार, मानकीकृत या शुद्ध व्यवहार , अनुभूति व्यवहार या विधायक विज्ञान के नाम से भी जानते हैं।


  • J.B. वाटसन नेसामाजिक मनोविज्ञान का परिचय” नामक अपनी पुस्तक में ही व्यवहार का वर्णन किया।


  • वॉटसन को 20वीं शताब्दी का चमकता हुआ सितारा माना जाता है।

  • वाटसन वंशानुक्रम और वातावरण दोनो पर व्यवहार या विश्वास करता है ।


वाटसन के अनुसार :- तुम मुझे कोई 10 बालक दे दो मैं उसे जो बनना चाहता हूं 10 अलग-अलग किस्म का बना दूंगा चोर, डाकू, इंजीनियर, डी0एम0,वकील, डकैत, मवाली, सज्जन, इज्जतदार, व्यज्जतदार व्यक्ति आदि।

व्यवहारवाद के उदाहरण JB  वाटसन महोदय के अनुसार :- जैसे कोई आदमी आया और आपसे बातचीत किया, आप उतने में ही यह अंदाजा लगा लेते हैं कि व्यक्ति सही है या फेकू किस्म का है।

किसी के व्यवहार का अध्ययन करना हो तो उसे बिना बताए कीजिए फिर देखिए। 

जैसे अगर आप के घर दुल्हन वाले बता के आप को देखने आए तब का असर या बिना बताए आए तब का असर में परिवर्तन आ जाएगा उससे व्यवहार का अध्ययन हो जाता है।

 नोट:- व्यवहार का अध्ययन बिना बताए ही किया जाता है।


मनोविज्ञान के सम्प्रदाय 


1 :-  संरचनावद / निर्माणवाद/ निर्मितवाद/ अंतानिरीक्षणवाद/ अस्तित्ववाद (Structuralism)


यह संप्रदाय 19वीं सदी के अंत में चेतना के विज्ञान से निकलकर 20वीं सदी के मध्य मनोविज्ञान में एक संप्रदाय के रूप में छा जाता है। यह संप्रदाय मनोविज्ञान का प्रथम एवम सबसे पुराना संप्रदाय है।


विल्हेम मैक्समिलियन वुण्ट (Wilhelm Maximilian Wundt :- 16 अगस्त, 1832 – 31 अगस्त, 1920) जर्मनी के चिकित्सक, दार्शनिक, प्राध्यापक थे जिन्हें आधुनिक मनोविज्ञान का जनक माना जाता है। वुण्ट ने मनोविज्ञान को विज्ञान माना और उन्होने ही सबसे पहले अपने आप को मनोवैज्ञानिक कहा।


विल्हेम वुण्ट 1832- 1920 इस संप्रदाय में 

वुण्ट यही कहते हैं कि हमारी जो चेतना है किस-किस तत्व से निर्मित है और इस चेतन की संरचना कैसे हुई, इसमें किन-किन तत्वों का अस्तित्व विद्यमान है। 1879 ईस्वी में जर्मनी के लिपजिंग शहर में स्थित लिपजिंग विश्वविद्यालय में विलियम वुण्ट को दर्शनशास्त्र विभाग का HOD बना दिया गया और वहीं पर वुण्ट ने मनोविज्ञान की प्रथम प्रयोगशाला स्थापित किया और संरचनावादी विचारधारा की स्थापना की साथ ही साथ प्रयोगात्मक मनोविज्ञान को जन्म दिया। इससे पहले मनोविज्ञान केवल विचारों में थी 

2015 में लिपजिंग विश्वविद्यालय का नाम बदलकर कार्लमार्क्स विश्वविद्यालय कर दिया गया।

इस प्रकार वुण्ट ने संवेदना, चेतन को समझने के लिए अंत:निरीक्षण विधि या अंतदर्शन विधि को जन्म दिया। वैश्विक स्तर पर मनोविज्ञान का जनक वुण्ट को माना जाता है। 

संरचनावाद विचारधारा का जनक वुण्ट है ।

अंतरदर्शन या अंत:निरीक्षण विधि का जनक वुण्ट है प्रयोगात्मक मनोविज्ञान का जनक वुण्ट है 


वुण्ट चेतना को दो भागों में विभक्त किया है 

1 संवेदना और 2 भाव 


संवेदना :- इंद्रियों द्वारा प्राप्त प्रथम अनुभव/ज्ञान अभ्यास।

फीलिंग :- अच्छा-बुरा , खट्टा-मीठा आदि के अनुभव को हम भाव कहते हैं।

जैसे :-  H²O =  मतलब H का एक O का 2 अणु से जल का निर्माण होता है यही संरचना या निर्माण ही संरचनावाद या निर्माणवाद की भी है।

जैसे :- भाव अचानक बाहर तेजी से मौसम बदल जाए और ठंड पड़ने लगे तो हमें सबसे पहले पंखा बंद करने की आवश्यकता पड़ेगी और गर्म कपड़े पहनने की जरूरत पड़ेगी यही भाव है। 

जैसे:- रसगुल्ला देखा तो मन में सबसे पहले मीठा होने का भाव उत्पन्न हो जाएगा। 


एडवर्ड ब्रेडफोर्ड टिचनर (USA) 11 जनवरी 1867से 3 अगस्त 1927 

संरचनावादी टीचर विल्हेम वुण्ट के शिष्य एवं सबसे प्रिय सहयोगी थे। जो उनके बाद 1892 ई0 में कार्नेल विश्वविद्यालय में संरचनावाद संप्रदाय की स्थापना की ।


बस संरचनावादी विचारधारा वुण्ट ने पहले दी और टीचर के गुरु भी थे इसीलिए उनको संरचनावादी विचारधारा का जनक या इस संप्रदाय का संस्थापक भी कहा गया।

किन्तु टिचनर को भी संरचनावाद संप्रदाय का संस्थापक माना गया ।


संरचनावाद संप्रदाय का विषयवस्तु :- 

चेतना :-  हम जो इस चेतन अवस्था में बैठे हैं और सीख रहे हैं। वही चेतना है।

टीचर ने चेतन तथा मन में अंतर किया।


चेतना :- वे सभी अनुभव जो व्यक्ति में एक दिए हुए क्षण में उपस्थित होते हैं  

मन:- वे सभी अनुभव जो व्यक्ति में जन्म से ही मौजूद होते हैं ।

टीचरों ने चेतना के तीन अंग बताएं हैं।

  1. संवेदना 

  2. भाव 

  3. प्रतिमा 

1 संवेदना :- पांचो ज्ञानेंद्रिय द्वारा प्राप्त प्राथमिक ज्ञान ही संवेदना है। 

2 भाव :- मतलब feeling 

3 प्रतिमा /बिंब :- Affection/Image :- हमारे मन को किसी इंद्रियों द्वारा जो प्राथमिक ज्ञान प्राप्त होता है। तुरंत इसकी प्रतिमा हमारे मन में बन जाती है। वही बिंब या प्रतिमा है ।

जैसे :- बाहर अगर अदरक वाली चाय बना रही है तो हमारे ज्ञानेंद्रिय (नाक) द्वारा  हमें पता चल जाता है। फौरन हमारे मन में वह स्वादिष्ट अदरक वाली चाय का एक कप में भरे बगल में टोस्ट नमकीन का चित्र बन जाता है। यही प्रतिमा है।

सबका एक में उदाहरण है :- किसी को आंखों से देखना संवेदना है उससे हम खुश थे यह भाव उसे 10 साल बाद भी देखा और पहचान गया यही प्रतिमा है ।





संरचनावाद संप्रदाय की विशेषता:- 

  1. मान व शरीर दोनों का अस्तित्व रहता है। इसलिए से अस्तित्ववाद भी कहते हैं। 

  2. शिक्षा को मानसिक क्रिया माना है। अंतर दर्शन के द्वारा मन के विभिन्न क्रियाओ  का अध्ययन किया जाता है।

  3.  संरचनावदियो ने चेतन व अनुभव पर बल दिया। 

  4. इसमें अंत:निरीक्षण विधि  तथा प्रयोगात्मक विधि की खोज हुई। 

  5. भावना,विचार,प्रतिमा चेतन मानसिक क्रिया का अध्ययन किया जाता है। 

  6. प्रायोगिक विधि को जन्म देने वाला संप्रदाय मनोविज्ञान के व्यवहार पक्ष/शुद्धता पर बल अर्थात मनोविज्ञान के नियम या तथ्यों की खोज पर बल दिया।


वॉलमैन के अनुसार :-  संरचनात्मक मनोविज्ञान व्यक्ति के जीवन काल में घटने वाली मानसिक क्रियाओ का अध्ययन कहलाता है । अर्थात मानव जीवन में जो घटना घटती है उसके मानसिक क्रिया का अध्ययन है।


















कार्यवाद/ प्रकार्यवाद/ प्रकार्यात्मकवाद functionalism 1890:- 


मनोविज्ञान में प्रकार्यवाद संप्रदाय का प्रारंभ और विकास अमेरिका में 1890 ई0 में हुआ। इस संप्रदाय का आरम्भ 1890 के आस-पास शिकागो यूनिवर्सिटी से माना जाता है,इसलिए इसे शिकागो संप्रदाय के नाम से भी जाना जाता है। 

जॉनडीवी के अनुसार विलियम जेम्स द्वारा प्रकार्यवाद की स्थापना अमेरिका के हावर्ड विश्वविद्यालय में की गई थी परंतु यह एक अनौपचारिक रूप से स्थापना थी। बाद में चलकर शिकागो विश्वविद्यालय में जॉन डीवी के द्वारा मनोविज्ञान का अध्ययन किया गया और प्रकार्यवाद की स्थापना औपचारिक रूप से किया गया।शिकागो यूनिवर्सिटी के अतिरिक्त कोलंबिया यूनिवर्सिटी में भी प्रकार्यवादी अध्ययन हुआ। 

कोलंबिया संप्रदाय:- इस विश्वविद्यालय में जेम्स कैटल, एडवर्ड थार्नडाइक और रॉबर्ट वुडवर्थ इस संप्रदाय के प्रवर्तक थे। 

कैटल ने प्रत्यक्ष ज्ञान, भौतिकी और सहचार्य पर जोर दिया।

थार्नडाइक ने बुद्धि मापन और अधिगम प्रक्रिया पर जोर दिया। 

रॉबर्ट वुडवर्थ ने तमाम प्रयोग एवं प्रयोगात्मक मनोविज्ञान पर (समकालीन मनोवैज्ञानिक संप्रदाय ) (contemporary school of psychology ) की किताब लिखी और प्रकार्यवाद में सामंजस पर बल दिया और कोलंबिया संप्रदाय का विकास हुआ।

इसने सबसे ज्यादा क्रियाविधि एवं चालक पर बल दिया। 

  • क्रियाविधि (Mechanism ):-  

  • चालक ( Drive ):- उत्तेजना 

इसमें सीखना एक मानसिक प्रक्रिया है बुडवर्थ ऐसा मानते हैं।

प्रकार्यवाद के समर्थक :- 1 जॉन डीवी को विलियम जेम्स का उत्तराधिकारी माना जाता है वास्तविक बात यह है कि डीवी के कारण ही प्रकार्यात्मक मनोविज्ञान चमक उठा। 

2 स्टेनली हाल, 3 हार्वे कार्र, 4 रॉलेट एंजिल, 5 वुडवर्थ 6 थार्नडाइक तथा थार्नडाइक के गुरु 7मैककीन कैटल हैं।

कैटल ने ज्ञानेंद्रिय द्वारा प्रत्यक्षीकरण पर जोर दिया फिर मानसिक क्रिया पर सर्वाधिक बल दिया।

विलियम जेम्स ने अमेरिका में एक बुक लिखी प्रिंसिपल ऑफ साइकोलॉजी (principle of psychology) जिसमें 1870 के आस-पास में ही मनोविज्ञान को दर्शनशास्त्र से अलग कर दिया। इसी कारण इन्हें अमेरिका में आधुनिक मनोविज्ञान का जनक कहा जाता है। 

और (principle of psychology) को मनोविज्ञान की पहली प्रमाणित पुस्तक माना गया। जो 1895 में जा के प्रकाशित हुई। जेम्स ने प्रकार्यवाद में चेतना के कार्यात्मक उपयोगिता पर बल दिया और एक बुक लिखि- 

टॉक टू टीच talk to teach 1894.

  • चेतना के कार्यों का या प्रभावों को समझने पर बल दिया। 

  • चेतन की जगह मानसिक क्रियाओ पर बल दिया ।

इस संप्रदाय में दो प्रश्न को तलाश करते हैं। 

1 व्यक्ति क्या करते हैं ? 

2 व्यक्ति कोई व्यवहार क्यों करते हैं? 

यदि दोनों प्रश्नों का उत्तर आपके पास है तो यह प्रकार्यवाद 

है। ऐसा वुडवर्थ मानते हैं।

प्रकार्यवादी संप्रदाय सीखने की प्रक्रिया में तीन चीजों को महत्व देता है।

1पाठ्यवस्तु  

2शिक्षण विधियां 

3मापन प्रक्रिया 

यह तीनों मिलकर मन मस्तिष्क में संरचनाओं को महत्व प्रदान करते हैं।

विलियम जेम्स ने ही सबसे पहले मूल प्रवृति शब्द का प्रयोग मनोविज्ञान में किया ।

जेम्स ने यह कहकर पूरी दुनिया को चौंका दिया कि हमारी चेतना तीनों कालों में रहती है इसे चेतना का धारा प्रवाह कहते हैं। जेम्स ने व्यक्तित्व का आत्म संप्रत्यय का सिद्धांत दिया जिसका अर्थ है खुद को पहचाना याद 

अपनी हदें जानना।

जेम्स ने संवेग का जेम्स लैंग सिद्धांत दिया जिसका अर्थ है व्यवहार पहले होता है और संवेग बाद में जन्म लेता है। 






















व्यवहारवाद :- प्रो0 जॉन ब्रॉडस वॉटसन 

( J.B. watson)J.B. वॉटसन 

J.B. वॉटसन द्वारा व्यवहारवाद संप्रदाय की स्थापना सन 1913 ई0 में जॉन हॉपकिंस विश्वविद्यालय अमेरिका में हुआ।

कारण:- 1912 से 1914 के बीच संरचनावाद के संस्थापक विलियम वुंट और प्रकार्यवाद के संस्थापक विलियम जेम्स के बीच द्वंद या संघर्ष हुआ ।

विलियम जेम्स ने कहा कि आप सब अभी तक चेतना संवेदना का निर्माण कैसे होता है इसमें कौन-कौन से तत्त्व पाए जाते है इसके पीछे क्यों पड़े हो । 

हमें सिर्फ चेताना के कार्यों का अध्ययन करना चाहिए इसलिए इस प्रकार का द्वंद चल ही रहा था कि J.B. वॉटसन आए और बोले आप सब चेतना संवेदना के तत्व और उसका निर्माण और ये कार्य कैसे करता है। चेतना की संरचना या अंत:निरीक्षण विधि के द्वारा कोई व्यक्ति अपने मन की बात कैसे व्यक्त कर सकता है। हो सके झूठ बोलता हो। इस विधि से किसी व्यक्ति के अंतर्मन को आप कैसे जान पाओगे हो सके वो झूठ ही बोलता हो।

 

इस प्रकार आप सब क्या संवेदना चेतन लगाए रखे हो हमें अध्ययन करना है, तो व्यक्ति के वाह्य स्थिति या व्यवहार का अध्ययन कीजिए  फिर J.B. वॉटसन  ने 1913 में व्यवहारवाद संप्रदाय की स्थापना कर दी ।

व्यवहारवाद शब्द की पहली बार प्रयोग में मैगडूगल ने अपनी पुस्तक आउटलाइन ऑफ साइकोलॉजी outline of psychology  में 1905 में ही किया और वही इस पुस्तक के 16वें पेज पर चेतन को बुरा शब्द बताया। J.B. वॉटसन  द्वारा इस संप्रदाय की स्थापना 1913 में एक अनौपचारिक स्थापना थी फिर बाद में चलकर इन्होंने 1924 में एक पुस्तक लिखी “व्यवहारवाद” इसमें औपचारिक रूप से व्यवहारवाद का एक विस्तृत वर्णन किया और व्यवहारवाद की पूरी जानकारी इसमें सम्मिलित की। यही से व्यवहारवाद की मुख्य स्थापना हुई । 

वॉटसन को 20वीं सदी का चमकता सितारा कहा जाता है। 

वॉटसन के अनुसार व्यवहारवाद की उत्पत्ति उद्दीपक और अनुक्रिया से ही होती है। 

समर्थनकर्ता :- B.F. स्कीनर, C.L. हल , मैक्डुगल, गुथरी, वुडवर्थ , 

वाटसन कहते हैं कि व्यवहारवाद का मतलब मनुष्य एवं पशु दोनों के व्यवहार का अध्ययन प्रक्रिया है। 

वॉटसन का मानना था कि व्यवहार उद्दीपक व अनुक्रिया दोनों का देन व्यवहार है।

उद्दीपक :- प्रेरणा, कार्य करने की प्रेरणा वस्तु या जीवनसाथी के लिए कार्य करने के लिए अग्रसर होना।


अनुक्रिया :- व्यक्ति या वस्तु को प्राप्त करने के लिए किया गया कार्य अनुक्रिया है ।


वाटसन के अनुसार:- जन्म के समय सभी शिशु समान होते हैं। आनुवंशिकता की आवश्यकता नहीं होती है। इन्होंने सिर्फ वातावरण को महत्व दिया है।

वॉटसन बोलते हैं तुम मुझे कोई या 10, 12 जो भी बालक दे दो वह किसी भी माता-पिता, स्थान, जलवायु, देश, परंपरा से हो मैं उसको जैसा चाहूंगा वैसा बन सकता हूं।

इसी दौरान वाटसन अपने 11 माह के अल्बर्ट नमक बच्चे पर 1920 में अपने सहयोगी रेनर के साथ मिलकर प्रयोग किया और अध्ययन किया जिसका निष्कर्ष निकला कि शिशु में भय, क्रोध, स्नेह तीन संवेग पाए जाते हैं।

वॉटसन ने हल द्वारा बताएं गए S.O.R. सूत्र का प्रस्ताव पास  किया । जिसको बाद में चल के बुडवर्थ ने S.O.R. को एक सिद्धांत के रूप में प्रतिपादित किया। वाटसन बोलते हैं यदि व्यवहार का अध्ययन करना है, तो इसके लिए चार विधि है- 

1 प्रेक्षण विधि :- अवलोकन या इसे निरीक्षण विधि भी कहते हैं।

2 अनुबंध विधि :- फिर उससे  जोड़ो या व्यवहार में बदलाव के लिए अनुबंध करना चाहिए। 

3 परीक्षण विधि :- फिर उसका परीक्षण कीजिए।

4 शाब्दिक रिपोर्ट :- तत्पश्चात एक रिपोर्ट पेश करो।























गेस्टाल्टवाद सम्रदाय/संज्ञानवाद/समग्रवाद 

संस्थापक:- मैक्स वर्दाईमर (1912)

सहयोग:- कोहलर, कुर्टलेविन, कोफ्का।

गेस्टाल्ट शब्द जर्मनी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है - पूर्णता/पूर्णाकार/समग्रता/संपूर्णकार ।

गेस्टाल्ट के अनुसार मनोविज्ञान व्यवहार + चेतन दोनों का विज्ञान है ।

  • 1 यह सिद्धांत पहले अनुबंधन का खंडन किया।

  • 2 फिर प्रयत्न एवं भूल का खंडन किया ।

पूर्णाकार समग्रता का मतलब :- पूर्णाकार या समग्रता का मतलब यह है कि अगर आपसे कहा गया कि आप चिड़िया की आंख में तीर मारिये तो आप को इस सिद्धांत के अनुसार कभी भी सिर्फ उसके आंख को देखने का प्रयत्न नहीं करना है। पहले आपको उस पेड़ को देखना है जिस पर चिड़िया बैठी है।  फिर डाली को , तत्पश्चात चिड़िया फिर चिड़िया की आंख को देखना है। तब फिर जा के तीर आंख में चलाना है। (गेस्टाल्टवाद)


जैसे:- एग्जाम हॉल में पहले पूरा पेपर देख लीजिए फिर एक-एक प्रश्न फिर एक-एक को हल करने का प्रयास कीजिए। सीधा प्रश्न को हल नहीं करना है। यही गेस्टाल्टवाद का सिद्धांत है।


चेतन (संवेदना):- मानसिक स्थितियों का आंतरिक अध्ययन है।

व्यवहार:- मानसिक स्थिति का वाह्य जगत में अभिव्यक्तिकरण है। 

अर्थात इसीलिए यह पूर्णता का व्यवहार या विज्ञान है।

क्योंकि इसमें दोनों का अध्ययन करते हैं ।

गेस्टाल्टवादी व्यवहार की संपूर्णता पर अधिक बल दिया।

गेस्टाल्टवाद का उद्देश्य :-  “पूर्ण से अंश की ओर”

संज्ञान वाद :- बुद्धि/ मनन/ चिंतन या विचारधारा ज्ञान से समस्या समाधान करेगा।

वर्दाइमर :- प्रत्यक्षीकरण (मूर्त वस्तु) पर सर्वाधिक बल दिया। 

पुस्तक:- “exprimental studies of the perfection movement” 

मैक्स वर्दाईमर (15 अप्रैल 1880 से 12 अक्टूबर 1943 )


कोहलर :- सीखना प्रयत्न एवं भूल सीखने से नहीं बल्कि सूझ समझदारी जरूरी है।

सूझ insight :- व्यक्ति में किसी समस्या का समाधान करते समय या किसी पाठ को सीखते समय अचानक विकसित होती है ।

शिक्षक को सूझ उत्पन्न करने के लिए विषयवस्तु के सभी पहलुओं का खुला अवलोकन करना चाहिए।

कोहलर कहते हैं कि हम कुछ कार्यों को करते हुए सीखते हैं और कुछ को दूसरों को करते हुए देखकर सीखते हैं। पर कुछ कार्यों को बिना बताए सीखते हैं,  यही सूझ द्वारा सीखना है ।

कोहलर जर्मनी से अमेरिका जा के 1916 में कनारी दीप समूह पर सुल्तान नमक चिम्पांजी पर एक प्रयोग करके निष्कर्ष निकाला कि सूझ और अंतर्दृष्टिविधि सीखने के लिए अत्यंत सहायक विधि है। 

  • गेस्टाल्टवादी अधिगम को एक संज्ञानात्मक प्रक्रिया मानते हैं ना कि किसी S.R.थ्योरी का परिणाम। 

उनका मानना है कि अधिगम एक चिंतनशील प्रक्रिया है। जिसके द्वारा अधिगमी सबसे क्रियाशील मानी जाती है ।

सूझ का मतलब :- सूझ को अंतर्दृष्टि (अहा! अनुभव) (aha !experience) भी कहा जाता है 


“समस्या समाधान के दौरान अचानक ही चिंतन करते अधिगम द्वारा मध्य एवं लक्ष्य साध्य एवं साधन के बीच अर्थपूर्णसंबंध का पता लगाकर समस्या समाधान कर लेना ही सूझ  है ।

कोहलर का अधिगम स्थानांतरण का सिद्धांत :-  इस सिद्धांत के अनुसार पहले एवं बाद के अधिगम में स्थानांतरण वहीं तक संभव होगा, जहां तक समानता पाई जाए। इसे ही कोहलर आरोपण कहते हैं ।


कोहलर की पुस्तक :- 

The mentality of species वन मानसून की मानसिकता

 The tost of gestalt 





















मनोविश्लेषणवाद संप्रदाय

सिगमंड फ्रायड 6 मई 1856 में वियना (ऑस्ट्रिया) के एक यहूदी परिवार में जन्म हुआ और 23 सितंबर 1939 में इनकी मृत्यु (U.K.) में हो गई।


सिगमंड फ्रायड इस संप्रदाय की शुरुआत 1900 के करीब में किया और जो 1912 तक चला ।

फ्रायड बाद में (फ्रांस) या पेरिस के पेंसी नगर में पागलों का डॉक्टर भी हुए। 


अध्ययन का नाम :- अचेतनमन 

विश्व का सबसे बड़ा पागलखाना फ्रांस के पेंसी में है।

यह ऑस्ट्रिया के तंत्रिका वैज्ञानिक, न्यूरोलॉजिस्ट तथा मनोविश्लेषण  psychoanalysis के संस्थापक भी थे।

क्षेत्र :- तंत्रिका विज्ञान, मनोचिकित्सा, मनोविश्लेषण इनके बच्चे :- मैथिल्डे, जीन मार्टिन, ओलिवर, अंसर्ट, सोफी और अन्ना फ्रायड आदि। 

यह एक मनोचिकित्सक और तंत्रिका वैज्ञानिक होने के नाते इन्होंने कई पागलों या मानसिक रोगियों को ठीक भी किया है ।


इसने “एक व्यक्तित्व का भी सिद्धांत” दिया है।

इस सिद्धांत से प्रभावित लोगों में उनके शिष्य कार्ल युंग और एडलर, एरिकएरिक्सन और उनकी खुद की पुत्री अन्ना फ्रायड सहयोग कर्ता के रूप में सामिल थीं ।

फ्रायड अपने इस सिद्धान्त में शैशवकामुकता पर ज्यादा जोर देते थे  इसलिए उनके शिष्य कार्ल युंग को ये बात ठीक से समझ नहीं आता था। और वह खिलाफ होकर एक अलग सिद्धांत विश्लेषणात्मक सिद्धांत दिया और एरिकएरिक्सन ने भी मनोसामाजिक सिद्धांत दिया ।



मनोविश्लेषणात्मक सिद्धांत के तीन पहलू हैं।


1 स्थलाकृतिक संरचना

इसमें फ्रायड ने मन के तीन अवस्थाओं का वर्णन किया है ।

  • चेतन मन ।

  • अर्द्ध चेतन मन या (अवचेतन मन)।

  • अचेतन मन ।

2 गत्यात्मक संरचना 

इसमें फ्रायड व्यक्तित्व का वर्णन करते हुए तीन भागों में विभाजित किया है।

  • Id इदम  ।

  • Ego अहम ।

  • Super ego परम अहम ।

 

3 मनोलैंगिक विकास का सिद्धांत 

इसमें बच्चे (बालक) के कामप्रवृत्ति के आधार पर पांच भागों में विभाजित किया है ।

1 मुखीय अवस्था 

2 गुदीय अवस्था 

3 लैंगिक अवस्था 

4 प्रसुप्ति अवस्था 

5 जननेंद्रिय अवस्था 


4 फ्राइड का स्वप्न विश्लेषण विधि 

हमारा अचेतन मन खुद को प्रकट करने के लिए परेशान रहता है लेकिन चेतन मन उसे प्रकट होने से रोकता है। लेकिन अचेतन मन मौका पाते ही जुबान फिसलने द्वारा मन या नींद में बड़बड़ाने द्वारा या स्वप्न द्वारा खुद प्रकट कर लेता है। 

अर्थात वह विधि जिसमें अचेतन मन का अध्ययन सपनों के माध्यम से किया जाता है। उसे स्वप्न विश्लेषण विधि कहते हैं ।

5 फ्राइड का विस्मृति का सिद्धांत 

इस सिद्धांत को सक्रिय विस्मृति या दमन का सिद्धांत भी कहते हैं । जिसमें फ्रायड ने प्रसिद्ध जर्मन मनोवैज्ञानिक हर्मन एबिंगहास के विस्मृति के निष्क्रिय विस्मृति/अभ्यास के सिद्धांत के खिलाफ दिया है। 

फ्रायड के अनुसार व्यक्ति अपनी दुखद यादों को जानबूझकर (सक्रिय) बल पूर्वक दमन/भुला देता है। 

6 फ्रायड का अभिप्रेरणा का सिद्धान्त


1 जीवन मूल प्रवृत्ति जिजीविषा 


जीवन इच्छा iros इरोस 

पासवर्ड (सफलता)Positive 

(सब कुछ बढ़िया)



2 मृत्यु मूल प्रवृत्ति 

निराशावादी या मृत्यु मूलक

Thanatos थायनाटोस

पासवर्ड (असफलता) Negative 

(अचानक गड़बड़ हो जाए)





1 फ्रायड का स्थलाकृतिक संरचना इसमें फ्रायड  उस समय पेंसी नगर स्थित पागल खाने में पागलों के चिकित्सक अर्थात मनोचिकित्सक के पद पर थे। और वहीं पर बहुत पागलों को ठीक भी किया और मन की तीन संरचना को बताया ।

अचेतन मन (Unconscious mind) 90% और चेतन मन (conscious mind)और अर्द्ध चेतनमन (subconscious mind) मिला के 10%है।


1 अचेतन मन (Unconscious mind)

अर्थ:- इसमें वह सब अनुभूतियां रहती हैं जो सामाजिक प्रतिबंध ,कामुक प्रवृत्ति , आक्रामक के कार्य पूरी न हुई हों जो पहले चेतन मन में थी ।

यह मन की सुप्तावस्था है। इसमें अनैतिक कार्य, दमित इच्छाएं, गुंडागर्दी, कटु अनुभूतियां होती हैं ।

जिन बातों को हम छुपाए रखते हैं यही दमित भंडार गृह में चला जता है।

यह मन जन्मजात विचारों का आंतरिक रूप यही भावना कहलाती है ।

संवेग- विचारों का वाह्य प्रकाशन, मूल प्रवृत्ति, विचारों का क्रियात्मक रूप, सामाजिक इच्छा, यौन ऊर्जा, इच्छाओं का जन्मदाता, सुखवादी सिद्धांत पर कार्य करता है।

आनंद का सिद्धांत , आनंदवादी मन 

यह सिद्धांत बिना कुछ सोचे समझे बालक को खुश रखने का प्रयास करता है।

जैसे:- अगर कूकर से सीटी आना बंद हो जाए फिर खतरे का सूचक है। वह व्यक्ति जो बोलते ही नहीं है गुनगुन सांप जिन्हें कहते हैं। अर्थात् चुप्पी मारने वाले व्यक्ति बहुत ही खतरनाक होते हैं।

  • बिना सोचे समझे किसी पर आक्रमण करना यह अनैतिकता या अचेतनमन के चरण का कार्य है । 


 2 अर्द्धचेतन मन (subconscious mind)

अर्थ:- वह जानकारी जो जरूरत पड़ने पर प्रयास करने पर याद आ सकती है उसे हम अर्द्धचेतन मन कहते हैं।


परिभाषा है :- “वह अनुभूतियां संचित रहती हैं जिसमें व्यक्ति वर्तमान में अवगत नहीं रहता लेकिन थोड़ी कोशिश करने पर उससे अवगत हो जाता है।” 

या इसमें वह बातें आती हैं जैसे हम बात करते हैं हकला जाते हैं। याद रहता है पर अटक-अटक कर बात निकलती है। भूलना, रुक-रुक कर बोलना आदि प्रवित्तियां सम्मिलित हैं । 

जैसे:- अगर कूकर में सीटी रुक-रुक कर आ रही है तो समझ लो कुछ गड़बड़ी है। याद की गई बातों को भूल जाना पर थोड़ा सा दिमाग लगाकर याद में लाना। 

  • विद्यार्थी के लिए बहुत महत्वपूर्ण मन है।

  • तार्किक मन 

  • समय बताने वाला सिद्धांत या मन है।

  • वास्तविकता का ज्ञान कराने वाला यह सिद्धांत है कि अगर कुछ चोरी किया तो मार पड़ेगी ।

  • चेतन व अचेतन के मध्य की अवस्था है ।

3 चेतन मन 10%

वह  अनुभूतियाँ जिससे व्यक्ति वर्तमान से पूर्णता अवगत रहता है। 

  • एक व्यक्ति की जागृत अवस्था है। 

  • जो वर्तमान समय  में कार्य चल रहा है 

  • जो वास्तविकता का परिचय वर्तमान समय में करता है। 

  • नैतिकता के सिद्धांत पर कार्य करती है।

  • नैतिक मूल्यों का भंडार ।

  • आदर्शवादी मन। 

  • आध्यात्मिक प्रवृत्ति की ओर ले जाने वाला मन। 

  • आदर्शवादी में नेहरू जी भी आते हैं । जैसे कोई गाली दे रहा है गलती नहीं है फिर भी नेहरू अपनी गलती मान लेते हैं, कि भाई माफ़ कीजिएगा मेरी गलती थी। 

  • इंदिरा गांधी यह अर्द्ध चेतन मन की तरह हैं जैसे तुम अगर मुझ पर आक्रमण करोगे तो मैं भी तुम पर आक्रमण कर दूंगी। यही वास्तविकता का ज्ञान कराता है। 

  • इन तीनों अवस्था को फ्रायड ने बर्फ के एक टुकड़े से तुलना किया है जिसमें अचेतन मन 90% है जिसे हम अतृप्त इच्छाएं कहते हैं। और चेतन मन और अर्द्धचेतन मन दोनों मिलकर 10% में रहते हैं। 

  • अगर यह 10% है तो आप सबको चाहिए इसको सुरक्षित रखने का प्रयत्न करना चाहिए।

















2 सिगमंड फ्रायड का  गत्यात्मक  संरचना  गत्यात्मक संरचना में तीन प्रकार बताएं हैं।

1 इदम  

बेलगाम घोड़ा , मारकाट, कामवासना, अनैतिकता आदि का समावेशन। 

2 अहम  

घुड़सवार।

यह इदम और पराअहम में  संतुलन बनाता है। वास्तविकता में जीता है।

3 पराअहम

घोड़े की लगाम ।

कानून , नियंत्रक , पिता , पुलिस, न्यायालय, धर्म, नैतिकता।

(पर पराअहम के लिए मम्मी अपवाद स्वरूप हैं क्यों की यह नियंत्रण नहीं कर पाती है , इनको बच्चे जल्दी बेवकूफ बना देते हैं।)


1 इदम (id):- 

इदम को मनुष्य के रूप में दानव अर्थात (devil in a man ) के नाम से भी जानते हैं। इसका संबंध शैशवावस्था से होता है।

नोट:- एक संतुलित व्यक्ति के लिए यह जरूरी है कि इदम एवं पराअहम की बात माने। क्योंकि अहम वास्तविकता में जीता है।

इदम शैशवावस्था में कार्य करता है। इसमें बालक और बालिका अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। इसीलिए इसको भौतिकवादी, सुखवादी या बिना नैतिकता के सिद्धांत के नाम से भी जानते हैं। 

यह अचेतन मन का शिष्य है। क्योंकि अचेतन मन में भरे कचरे को यह हकीकत में बदलने लगता है। अनैतिक बात, चरित्रहीन बात, असामाजिक बात, आतंकवादी बात,  रेप, डकैती, मार-काट सब अचेतन मन में भरा पड़ा हुआ रहता है। 

नोट:- एक व्यक्ति अपने जीवन में कभी ID का, या Ego का , तो कभी Superego का रूल अदा करता है।

पर एक साथ कोई नहीं कर पाएगा क्योंकि तीनों का प्रदर्शन जरूर सब करते हैं, लेकिन कोई एक साथ नहीं कर पाएगा ।

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    कुशमायोजित होता है जो व्यक्ति अपने आप को समाज में समायोजित ना कर पाए वो कुसमायोजित कहलाता है । 

जैसे एटीएम चुराना, डकैती,अनैतिक कार्य, बैंक लूटने आदि यह समाज के लिए या समाज में इसका समायोनज नहीं हो पता है।

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    इदम का उदाहरण जैसे मेज पर सोने की एक वस्तु रखी गई है या नोट की गड्डी रखी गई है और आपको आवश्यकता भी है तो आप सोचो पैसा लेकर भाग जा रहे हैं जो होगा देखा जाएगा ।

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    किसी भी परिस्थिति में कार्य को संचालित करने को इदम कहते हैं

जैसे बारात में द्वार पूजा के समय छत पर लड़की देख कर उसको लाइन मारना या नंबर देने का संबंध है।

2 अहम Ego :- वास्तविक सिद्धांत  इसका संबंध चेतन मन से होता है। इसको मनुष्य के रूप में मनुष्य (man in a man) कहते हैं।

  • अच्छे बुरे कार्यों को सोच समझकर करना ।

  • भ्रम की अवस्था में आना ही ego है। 

जैसे बच्चा सोंचे भविष्य के लिए पढ़े या ना पढ़े क्या करें कि क्या ना करे ,  बिजनेस करें, साइंस पढ़े, आर्ट पढ़े , कॉमर्स पढ़ें यही भरम इगो है।

  • इसमें नैतिकता स्थिति के अनुसार होती है।

जैसे बच्चा मेज पर रखा सोना ले या ना ले क्या करे क्या ना करे , करने का विचार आता है फिर सोचता है सब हट जाते हैं तो ले लेते हैं ताकि कोई देख ना पाए यही विचार मतलब सोचना,समझना ही ego है।

यह पूरी रूप से समायोजित होता है।

समाज में डर भय के कारण सोच समझ कर कार्य करना।


3 सुपर इगो (superego) पूर्ण नैतिकता/नैतिकता वाली भुजा/ आदर्शवादी सिद्धांत/ सिद्धांतवादी सिद्धान्त 

(Angle in a man) मानव के रूप में देवदूत

इसमें समाज के अनुसार एक नियम होता है उसके खिलाफ एक कदम नहीं जाता । ये कुसमायोजित होते हैं । क्यों कि इनमे बहुत ज्यादा नैतिकता, बहुत ज्यादा सामाजिकता, ज्यादा सैद्धांतिक कार्य सम्मिलित होते हैं।


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    जैसे कुछ घर में नियम बने रहते हैं:- प्याज ना खाओ, लहसुन ना खाओ , चप्पल पहन के ऊपर न जाओ, सुबह उठकर स्नान करो, फिर खाना बनाना। सबको सुबह-सुबह प्रणाम करो, ऐसे नियम को सुनकर पालन करने वाला कभी-कभी खुद को वहा समायोजित नहीं कर पाता है। 

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    ज्यादातर घर में रहने वाली बहुऐं अपने आप को कुसमायोजित कर लेती हैं। 

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    ईमानदारी/ पूर्ण सच्चाई/ पूर्ण नैतिकता या सख्त लौंडा, वाली अवस्था इसको कहते हैं।

3 मनोलैंगिक विकास का सिद्धांत की अवस्थाएं 

मनोलैंगिक सिद्धांत इस अवस्था में सिगमंड फ्रायड ने कामप्रवृत्ति पर जोर दिया है । इसमें 5 अवस्थाएं हैं।

 1 मुखीय अवस्था :- (0 - 1 वर्ष) शैशवावस्था 

इसमें कामप्रवृत्ति मुख क्षेत्र में होती है। अंगूठा चूसना, किसी भी वस्तु को मुख में ले जाना।  

2 गुदीय अवस्था (1 - 3 वर्ष) शैशवावस्था

इसमें गुदा क्षेत्र में काम प्रवृत्ति होती है। 

जिसकी वजह बच्चा जिद्दी आक्रामक हो जाता है।

जिसकी वजह से रोने लगता है। 

रोने की सबसे ज्यादा कार्य बच्चा इसी अवस्था में कारता है ।

3 लैंगिक अवस्था (3 - 6 वर्ष) शैशवावस्था।

काम प्रवृत्ति जननांगों की तरफ होता है किंतु सिर्फ जननांगों को पहचानता है। इसी अवस्था में ऑडिपस और  इलेक्ट्रा ग्रंथि पाई जाती है । जिसमे लड़का अपनी मां से सबसे ज्यादा प्रेम करता है और लड़की अपने पिता से सबसे ज्यादा प्रेम करती है।

इलेक्ट्रा ग्रंथि :- बच्ची शिकार होती है, पितृ प्रेम एवम मातृ ईर्ष्या।

ऑडिपस ग्रंथि :- बालक शिकार होता है, मातृ प्रेम एवम पितृ ईर्ष्या।

4 प्रसुसुप्ति अवस्था (6 - 12 वर्ष ) बाल्यावस्था  

  • कम प्रवृत्ति रहित अवस्था

  • पढ़ने की अवस्था।

  •  लड़के- लड़के और लड़की-लड़की के साथ खेलना पसंद करती हैं ।

  • अपने समलिंगी के साथ खेलना, दोस्ती,और प्रत्येक कार्य करना पसंद करते हैं।

5 जननेंद्रिय अवस्था :-  ( 13 - 19) किशोरावस्था 

वय:संधि  जननांग विकसित होते हैं।

बालक व बालिका में संतान उत्पत्ति के लायक विभिन्न शारीरिक परिवर्तन होने वाली अवस्था है ।

बालिकाओं में गर्भावस्था का निर्माण शुरू होता है।










4 फ्रायड का अभिप्रेरणा का सिद्धान्त

इसी के अंतर्गत सिगमंड फ्रायड के अनुसार मूल प्रवृत्ति के सिद्धांतो को बताया गया है।

1 जीवन मूल प्रवृत्ति :- 

जिजीविषा iros कहते हैं। 

इसमें आशावादी व्यक्ति आते हैं। 

जहां जी रहे हो वह आशावादी हैं। 

ढेर सारी इच्छाओं को पूरा करने के लिए जिस-जिस दौर से गुजर रहे हो वही आशावादी या जीवन मूल प्रवृत्ति जिजीविषा है।

जैसे :- पढ़ाई-लिखाई । 

2 मृत्यु मूल प्रवृत्ति :- 

निराशावादी,खतरनाक रौद्र रूप है। 

इसमें खुद का विनाश, दूसरों का विनाश,मार काट, गोला, बारूद, गुंडागर्दी,आतंकवादी, डकैती आदि ऐसे प्रवृत्ति आते हैं।

जीवन मूल प्रवृत्ति की सबसे महत्वपूर्ण मूल प्रवृत्ति है।

कामप्रवृत्ति :- 

काम प्रवृत्ति की ऊर्जा को “लिबिडो” कहा जाता है। लिबिडो “कामवासना” को कहते हैं।

इसी लिबिडो में दो ग्रंथियां पायी जाती है।

ऑडीपस और इलेक्ट्रा ग्रंथि  पर यह काम ग्रंथ होती है।

इलेक्ट्रा ग्रंथि :- बच्ची शिकार होती है, पितृ प्रेम एवम मातृ ईर्ष्या।

    ऑडिपस ग्रंथि :- बालक शिकार होता है, मातृ प्रेम एवम पितृ ईर्ष्या।

सिगमंड फ्रायड के अनुसार :-  

यह ग्रंथि सिर्फ शैशवास्वथा में पाई जाती है।

यूनान में एक ऑडिपस नाम का लड़का था, जो अपनी माता से प्रेम करता था और अपने पिता की मृत्यु करना चाहता था।  यूनान में ही एक इलेक्ट्रा नाम की लड़की थी। जो अपने पिता से प्रेम करती थी और अपनी माता की मृत्यु करना चाहती थी । 

यह तीन से 6 वर्ष के अंतर्गत शैशवावस्था में पाई जाती हैं , न कि किसी बड़ी अवस्था में नही तो कोई बड़ा लड़का होगा तो मां-बाप की ही हत्या कर डालेगा ।

नार्सीसिज्म :- आत्म प्रेम/ स्वमोह इसी को कहते हैं।

यह शैशवावस्था में होता है।

इसमें एक सुंदर सा प्यारा सा लड़का एक जंगल में जंगल के रास्ते जा रहा था । उसको जोर से प्यास लगी थी फिर वह नदी की तरफ गया। और जैसे ही नदी में पानी पीने का प्रयास करता है। लड़का अपने खूबसूरत चेहरे को देख लेता है और वही अपने चेहरे को इस स्वमोह और आत्म प्रेम के कारण अपने चेहरे को पानी में देखते ही रह गया। और तब तक देखता रहा जब तक उसकी मृत्यु न हो गई। लड़के के मरने के बाद उसी स्थान पर एक पेड़ उगता है, उसी को नार्सीसिज्म कहते हैं।

सिगमंड फ्रायड के इन्ही कामवासना पर ज्यादा जोर देने से इनके शिष्य कार्ल जुंग, और फ्रायड के सहयोग एरिक एरिकशन ने इनसे अलग हो के दोनो लोगो ने एक अलग संप्रदाय बना लिया।

कार्ल जुंग :- विश्लेषणात्मक 

एरिक एरिकशन :- मनोसामाजिक 









फ्रायड के कुछ शब्द 

1 नार्सिसिज्म ( Narcissism) :- 

यह शब्द शैशवावस्था में स्वार्थी प्रवृत्तियां / स्वप्रेम का अर्थ देता है। किशोरावस्था में खुद पर मोहित हो जाने या स्वमोह का अर्थ देता है। 

2 प्रतिक्रिया निर्माण (Reaction formation):- 

अपनी गलती को अनदेखा करके दूसरों की गलती पर ध्यान देना ।

3 व्यक्तीकरण  (Rationalization):- 

प्रयास करने पर भी सफलता न मिलने से हार ना मानकर बहाने बनाना। 

जैसे:- लोमड़ी बोलती है अंगूर खट्टे हैं 

4 विस्थापन  (Displacement) :- 

एक जगह की भड़ास दूसरी जगह निकलना।

जैसे:- अध्यापक की डांट खाकर घर आए छात्र अपनी छोटी बहन को डांटता है ।

5 प्रक्षेपण (Protection):-कोई व्यक्ति अपनी भावनाओं को किसी दूसरे व्यक्ति या वस्तु पर स्थानांतरित कर दे. यह एक अचेतन रक्षा तंत्र है, जिसके ज़रिए व्यक्ति अपनी भावनाओं को उस मूल स्रोत से दूर रखता है जो खतरनाक या अस्वीकार्य लगता है. विस्थापन के कुछ उदाहरण ये हैं: 

अपनी गलती दूसरे पर मढ़ना ।

जैसे:- 1 लापरवाही के कारण असफल हुए छात्र का परीक्षक को दोष देना। 

2 अगर कोई प्रबंधक किसी कर्मचारी पर चिल्लाता है, तो कर्मचारी उस रात बाद में अपने जीवनसाथी पर चिल्ला सकता है। 

6 दिवास्वप्न (Daydreaming):- 

वास्तविक जीवन में असफल व्यक्ति का कल्पना में सफल होकर खुश होना।

7 प्रत्यागमन (Regression) :- 

उम्र या  परिस्थिति के विपरीत व्यवहार करना।

जैसे:- किसी के मर जाने पर ठहाके लगाकर हंसना।

8 तादात्मीकरण / पहचान निर्माण ( Identify formation):- 

अपनी पहचान से कुछ न होने से किसी प्रसिद्ध व्यक्ति से अपनी पहचान जोड़ लेना।

(अपनी पहचान को प्रसिद्ध व्यक्ति से जोड़ना।) 


9 मार्गांतरीकरण  ( Deflectio ):- 

किसी व्यक्ति की ऐसी आदत जो अभिशाप बन गई हो आदत का मार्ग बदलकर उसे वरदान बनाना।

जैसे:- मुक्का (घूंसा) मारने में माहिर या निपुण व्यक्ति को किसी प्रतियोगिता में बॉक्सर बनाना। 

10 शोधन  ( Refinement ):- 

किसी गलत आदत को (संवेग को) प्रत्यक्ष प्रकट न करके परोक्ष प्रकट करना। 

जैसे:- किसी व्यक्ति का कामवासना से परेशान चरित्रहीन होने के कारण चित्रकार या मूर्तिकार बन जाना ।

11दमन  (Repression):

विनय न मानत जलधि जड़, गए तीनि दिन बीत।

बोले राम सकोप तब,भय बिनु होत न प्रीत।।

जब कोई विकल्प ना बचे, जब हर जतन निरर्थक हो गया हो तो ऐसे में लास्ट में पूरी ताकत लगाकर जड़ से समाप्त कर देना ही दमन है। दमन के कुछ फायदे और नुकसान भी हैं।


12 क्षतिपूर्ति (compensation):- 

किसी कार्य को करने में ललक हो तो वह नहीं कर पाया पर पुनः उसकी पूर्ति कर देना ही क्षतिपूर्ति है।

मेरे हाथ से किसी का नुकसान हो तो उसे उसी रूप में उसका पूर्ण करना ही क्षतिपूर्ति है ।


13 लिबडो :- 

यह फ्रायड के द्वारा बनाई गई सकारात्मक ऊर्जा है जिसे कामवासना कहते हैं।

14 शमन  (Mitigation):- अगर कोई संवेग किसी व्यक्ति में बहुत ज्यादा हो तो उसे शांत करना ही शमन है।











Ckass 2nd 
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KRISHN KAPOOR KMG

I am a writer. My First Book (Kalam A Pari) And second book (Pranay ki yatharthta). Village-Savargah, District-Ambedkar Nagar (Uttar Pradesh).

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