Krishn kapoor kmg ki shayri

गजल



(1)

तुमने हमे भुला दिया तो वफ़ा करें क्यूँ?
ऐ परी तुझपे भरोसा करें क्यूँ ?
तेरे दिए हुए जख्म आज भी हरे - भरे हैं ।
ये तेरी आखिरी निशानी है तो दवा करें क्यूँ ?
मतलब-मतलब निकल गया तो जाओ।
मुझे अपना माना नहीं तो गीला करें क्यूँ ?
ये आँखे भी ले जाते साथ अपने।
अब तुम्हारे तस्वीर को देखा करें क्यूँ ?
ढूंढ के मार क्यूँ न दें उन सारे रक़ीबो को ।
फ़क़्त दुनिया में पागलों सा टहला करें क्यूँ ?
ये दुनिया इब्तदाई से जानती है हम दोनों को।
अब विछड़ते वक़्त तुमसे झगड़ा करें क्यूँ?





(2)

अब इश्क़ की राह में वो सफर नहीं आता।
जो जिगर हुआ करता था इधर नहीं आता।
भटक चुके हैं इस क़दर राहे इश्क़ में ,
वस्ल कैसे करें उनसे कोई रहबर नहीं आता।
अब कोई सुनता नहीं मेरे फिराक की सदाएं ,
अब तो अदावत करने भी हमसफ़र नहीं आता।
सब ए महताब में पढ़ लेता था रुखसार की आँखे ,
अब तो मेरी हालत बताने अहल ए नजर नहीं आता।
कितना बे नियाज़ी है मेरा चारासाज कपूर ,
वो दैर व हरम में भटकता है मेरे घर नहीं आता ।

वस्ल - मिलन,फिराक - दुःख, अदावत - दुश्मनी, 
शदा - आवाज़ बे नियाजी - बेपरवाह, दैर- मंदिर , हरम- मस्जिद


                 
(3)

तेरे जाने के बाद हम बिखर जाएंगे ।
पर आप मुझसे दूर किधर जाएंगे।
मेरे रास्ते मंजिल सवालात सब का हद है तूं,
अब तो जी में आता हद से गुजर जाएंगे।
हम कहते थे न ये कसमें वादे सब झूठे हैं ,
अगर सच होंगे तो हम आप भी मर जाएंगे।
मुझे लौटा दे वो मेरे सारे वादे हां ,
अब तो कसम खाने से भी मुकर जाएंगे।
तुम हमे छोड़ के जाओगी तन्हा करोगी ,
इससे पहले हम तुमसे बिछड़ जाएंगे।
अगर मैं मर के जी गया तुम्हारे इश्क़ में ,
तो आप मेरे जहन से भी उतर जाएंगे।


                 
 (4)

एक मैं और एक तूँ एक तराना बन गया।
देख तुझे ही देखते ही मैं दीवाना बन गया ।
मुझे मालूम हुआ कल ये बादल मोहब्बत करता है,
जब तेरे धूप में निकलते ही शामियाना बन गया ।
ये आफताब ये महताब देख सब आ गए नीचे,
दीवाने ऐसे हो गए कि यहीं ठिकाना बन गया ।
मिली है मुझको वो शोहरत वो इज़्ज़त तुम्हे पाके,
जितने शय तूने छुए देख खज़ाना बन गया ।
तू ऐसी शम्मा है कि चाँद तारे भी रौशन होते है तुझसे ,
मैं भी चुराने के लिए कुछ नूर देख फरवाना बन गया।


                
  (5)

बिछड़ने वाले कभी-कभी तेरा ख्याल आता है ।
बिछड़ गए थे क्यूँ मुझसे यही सवाल आता है ?
मैं रोऊँ दर-बदर भटकूँ बताऊं सारी दुनिया को ,
मेरे जहन में बस एक तूँ ही मिसाल आता है ।
कभी मिलना तो करना लाखो सवालात ,
हम भी देखेंगे कि कितना सवाल आता है ?
ये दुनिया थपकियाँ दे कर मुझको सुला देती है ,
मेरे सोते ही मेरी धज़्ज़ियाँ उछाल आता है।
सुबह तूँ नहीं आती तो लगे थे खिड़की में जाले ,
शाम होते ही ये जाला कौन निकाल आता है ।
मैं देखना नहीं चाहता फिर भी देखने लगता हूँ ,
वो मंज़र ही कुछ इस कदर कमाल आता है ।
मैं उस दिन तेरा हो गया जिस दिन पता चला मुझे,
कि मेरी हर एक गलती तूँ दरिया में खंगाल आता है।


              
   (6)

इतने दिन कहां थे कुछ जवाब तो दे ?
है मोहब्बत कितना तुझको हिसाब तो दे ?
तेरे बगैर सब अँधेरा था अँधेरा ही रहा ,
ये जुगनूं ,चाँद सब फीके हैं आफताब तो दे ?
मैंने उम्र गुज़ार दी लिखने में इक कलाम तेरा ,
तूँ भी मुझको छोटी-मोटी किताब तो दे ।
क्या कहा - काबिलियत नही मुझमे तुझे समझने का ?
चंद लम्हों में समझ जाऊं मुझे शराब तो दे ।
सारी दुनिया ख्वाब देखता है तेरा ऐ रुखसार सुन ,
मैं भी खो जाऊँ तुझमे कुछ ऐसा ख्वाब तो दे।


           
    (7)

लोग राज पूछते हैं मेरे बदल जाने का ।
 टूट के बिख़र के सम्भल जाने का ।
अँधेरी रात में सहमा हुआ था ये अधूरा चाँद ,
मुझसे रास्ता पूछता है वीरान महल जाने का ।
शहर होता ही नहीं अब हमारे शहर में यारों ,
सूरज में नूर ही नहीं है अब उबल जाने का ।
फिर थक के मैंने कुछ जुगनुओं से दोस्ती कर ली ,
उनमे हुनर था बुझ के जल जाने का ।
वो आयी है अरसे बाद मुझसे मोहब्बत करने ,
कोई रास्ता बताए उसको निकल जाने का।


                  
  (8)

कहाँ पे खो गया मेरा यार दीवार ओ दर से पूछते हैं?
वो खडी थी उस पर हम इधर से पूछते हैं।
बड़े अर्शे बाद आये थे उसके शहर में यारों ,
भटक गए गली में हम पता हर घर से पूछते हैं।
गुज़ार दी सारी जिंदगी इक तेरा दीदार करने में ,
हुआ था क्यों इश्क तुमसे ये उम्र भर से पूछते हैं?
मिल गई रास्ते में आखिर उसकी वालिदा मुझको ,
कहाँ पे रहती हैं रुखसार ये डर डर के पूछते हैं।
लगा ली फाँसी "कपूर" ने एक उनके रूठ जाने पर ,
वो मिलने तक नहीं आयी ये रात भर से पूछते हैं।


                    
  (9)

 बड़ा शीरी है तेरे लफ़्ज़ों में एतबार कर लूं क्या ?
वो पहले वाली गलती फिर एक बार कर लूं क्या ?
बड़े बेचैन से रहते हो तुम सुना है आज कल ,
मैं भी अपने आप को बीमार कर लूं क्या ?
जैसे हुआ करता था पागल अब नहीं होता ,
फिर वही पागलपन सवार कर लूं क्या ?
ये इश्क़ है या जुआ समझ नहीं आता ,
कुछ तौर तरीके तुमसे मैं उधार कर लूं क्या ?
हमने तो सब कुछ लुटा दिया था एक बार तुम्हारे लिए
अब अपने ख़ाक को भी तार-तार कर लूं क्या?
हजारो आशिक़ की कतार लगी है दहलीज पे
तुम मेरी ही रहोगी ये खंज़र आर पार कर लूं क्या?


                     
(10)

ज़िक्र तुम करना मिलने का जब थोड़ी रात हो जाएगी।
अब जरा छत पे आ जाना मुलाक़ात हो जाएगी ।
आवाज न देंगे हम तुमको न तुम बोलना मुझको ,
बस निगाहें हमसे मिलाना और हर बात हो जाएगी ।
लोग कहते हैं मोहल्ले में सब सूखा-सूखा है ,
कभी उधर भी निगाह फेर दो बरसात हो जाएगी ।
महताब नूर चुराता है मेरे रुखसार के रुख से,
छुप के बैठता है फ़लक में अभी जब रात हो जाएगी ।
नींद,चैन,लगाव सब कुछ खो गया उसके बिछड़ने पर।
कभी सोचा ही नहीं था ऐसी हालात हो जाएगी ।



               
  (11)

कभी-कभी मुझे उसमे तो वफ़ा दिखता है ?
है अलग-थलग मुझसे फिर भी खुदा दिखता है ।
आज भी उसके दीदार से फना है लाखों बीमारी ,
मुझे तो रूह-रूह में उसके दवा दिखता है।
जाड़ा,गर्मी,वर्षा सब मौसम हैं कर्ज़दार उसके ,
सूरज-चाँद भी हैं कर्जदार वो क्या से क्या दिखता है ।
भरी बज़्म में वो आयी थी एक बार शाम के वक़्त,
क़ुरबत बहुत थीं उससे मगर वो जुदा दिखता है ।
एक दिन हार के,थक के कर ली ख़ुदकुशी "कपूर" ने ,
वो फिर भी रक़ीबो में मुफ्तला दिखता है।



              
 (12)

मोहब्बत के वशूलों को एक दिन तोड़ जाएंगे ।
मोहब्बत में हुए बर्बाद मोहबत छोड़ जाएंगे।
रह लेंगे दर-बदर कहीं पर रुसवाई में ?
मरेंगे उनके ही खातिर कफ़न भी ओढ़ जाएंगे।
बनाएंगे हमारे बाद गर वो ख्वाब किसी के साथ, 
भरी महफ़िल में उनके ख़्वाब का घर फ़ोड़ जाएंगे।
मेरे मर जाने के ही बाद वो आएगी मिलने मुझसे ,
मिलेंगे नहीं,मौत की गाड़ी को भी मोड़ जाएंगे।


                
 (13)

वो कहते रहो जिगर के पास हां ये अच्छी बात है ।
करो न कभी किसी की आस हां ये अच्छी बात है ।
इश्क़ हो,लगाव हो या हो किसी से हिज़्र ,
मगर तुम बनना न देवदास हां ये अच्छी बात है ।
लगी है आग बस्ती में तो बुझा दो उसको मिलके सब,
पर कोई होये न बेलिबास हां ये अच्छी बात है। 
आना कभी महफ़िल में मेरे गले लगा लेंगे तुझको,
तुम मेरी हो रखो विश्वास हां ये अच्छी बात है ।
लगा दी बाज़ी "कपूर" अपने जान की एक दिन ,
तुमने भी माना मुझको ख़ास हां ये अच्छी बात है।






                   
(14)

वो बचपन की बातें वो कैसी नादानी थी।
कुछ भी चाहे मिलता था कैसी मनमानी थी।
छोटी-मोटी,खट्टी-मीठी रात की वो लोरी ,
कभी माँ सुनाती तो कभी अपनी नानी थी।
मेले में लगाता था पूरे मेले की कीमत ,
पास कुछ नहीं बस पापा की खेती-किसानी थी।
जो भी मिलता था मुझको बाँट के खाता था सब में,
शायद यही आदत मुझमे खानदानी थी।
पचासों कागज़ की नावें 10-20 टायर की गाड़ियां ,
हम खुद बना रखे थे ये बचपन की कहानी थी।
पच्चीसों मेल का खेल मुझको याद था उस वक़्त ,
अक्कड-बक्कड़ बम्बे-बो तो मेरी जबानी थी ।
न जाते थे कभी पढ़ने मार खाने के डर से ,
गिल्ली-गोली बाग़ में खेलो अपनी मेज़बानी थी।

                 
   (15)

अब उससे कुछ कहने का मन नहीं है ,
 उसके साथ रहने का मन नहीं है ।
उसने मिटा डाली मेरी शान व शौक़त सब ,
इतना जुल्म सहने का मन नहीं है ।
डाल आया हूँ तेरा खत उस दूर दरिया में,
अब दरिया का बहने का मन नहीं है ।
पहले था लुटाता था जान तक उसपे ,
अब मेरा उसपे मरने का मन नहीं है ।
हर बार डरता "कपूर"उसके एक रूठ जाने से,
पर उससे अब डरने का मन नहीं है।





KRISHN KAPOOR KMG

I am a writer. My First Book (Kalam A Pari) And second book (Pranay ki yatharthta). Village-Savargah, District-Ambedkar Nagar (Uttar Pradesh).

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